नेहरू का आशिक़ मिज़ाज भारी पड़ा ।

यदि सरदार वल्लभभाई पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने होते तो भारत कश्मीर,आतंकवाद, और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों/ समस्याएं खड़ी ही नहीं होती ।देश का दुर्भाग्य उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन आशिक़ मिज़ाज नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने थे।

राष्ट्रभक्ति की भावनाओं से उनका ह्रदय सराबोर था.दृढ निश्चय और राष्ट्र हित में कुछ भी करने के लिए कृतसंकल्प सरदार पटेल के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग उनके चरित्र का एक पक्ष प्रस्तुत करता है।

सरदार पटेल का सर्व महत्वपूर्ण योगदान था देशी राज्यों का भारतीय संघ में विलय . गृह मंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों(राज्यों) को भारत में मिलाना था। ये दुष्कर कार्य उन्होंने बिना रक्तपात व हिंसा के अपनी बुद्धिमता और कूटनीति के बल पर सम्पादित कर दिखाया।

देश को अखंडता का तोहफा देने वाले सरदार पटेल के साहस ने संभवतः देश के खंड खंड होने से बचाया और उ नके निर्णय देश हित में थे ।राष्ट्र-निर्माता ‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार पटेल को भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हे भारत का लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है।

देश के इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त तेवर के सामने नेहरू का आशिक़ मिज़ाज विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा ।

भारतीय सिविल सेवा के एम ओ मथाई जिन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया. मथाई जी ने एक पुस्तक “Reminiscences of the Nehru Age”(ISBN-13: 9780706906219) ‘लिखी ! किताब से पता चलता है कि वहाँ जवाहर लाल नेहरू और माउंटबेटन एडविना (भारत, लुईस माउंटबेटन को अंतिम वायसराय की पत्नी) के बीच गहन प्रेम प्रसंग था । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और अन्तिम वायसराय लार्ड माउन्टबेटेन की पत्नी एडविना के बीच रोमांस की चर्चा सर्वव्यापी है। एडविना की बेटी पामेला हिल्स ने भी इसे स्वीकार किया।
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भारत की बहुत सी समस्याओं के लिये आशिक़ मिज़ाज जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार माना जाता है। इन समस्याओं में से कुछ हैं:

• लेडी माउंटबेटन के साथ नजदीकी सम्बन्ध
• भारत का विभाजन
• कश्मीर की समस्या
• चीन द्वारा भारत पर हमला
• मुस्लिम तुष्टीकरण
• भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन का समर्थन
• भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देना
• हिन्दी को भारत की राजभाषा बनने में देरी करना व अन्त में अनन्त काल के लिये स्थगन
• भारतीय राजनीति में कुलीनतंत्र को बनाये रखना
• भारतीय इतिहास लेखन में गैर-कांग्रेसी तत्वों की अवहेलना

सन १९६५ के बाद भी भारत पर अंग्रेजी लादे रखने का विधेयक संसद में लाना और उसे पारित कराना : 3 जुलाई, 1962 को बिशनचंद्र सेठ द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू को लिखे गये पत्र का एक हिस्सा निम्नवत है-

राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति सरकार की गलत नीति के कारण देशवासियों में रोष व्याप्त होना स्वाभाविक है। विदेशी साम्राज्यवाद की प्रतीक अंग्रेजी को लादे रखने के लिए नया विधेयक संसद में न लाइये अन्यथा देश की एकता के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।…यदि आपने अंग्रेजी को 1965 के बाद भी चालू रखने के लिए नवीन विधान लाने का प्रयास किया तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

डा. राममनोहर लोहिया ने संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऐशो आराम पर रोजाना होने वाले 25 हजार रुपये के खर्च को प्रमुखता से उठाया था। उनका कहना था कि भारत की जनता जहां साढ़े तीन आना पर जीवन यापन कर रही है उसी देश का प्रधानमंत्री इतना भारी भरकम खर्च कैसे कर सकता है।

एक बार सरदार पटेल ने स्वयं एच.वी. कामत को बताया था कि ”यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीरी मुद्दे को निजी हिफाजत में न रखते तथा इसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह इस मुद्दे को भी देश-हित में सुलझा देता।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज गोपालाचारी ने लिखा-”निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता।

सच में देश को लौहपुरुष की बहुत जरूरत है ,..काश सरदार पटेल प्रधानमन्त्री होते तो देश का हाल कुछ और ही होता ,…..आशिक़ मिज़ाज नेहरू की चाटुकारी नीति आज तक देश को खा रही है ,..कब तक खाती रहेगी ?…पता नहीं

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Filed under Congress, Hindi Articles, History of India, International Affairs, Politics

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