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क्यों है मोदी ८७% हिन्दुओ की पहली पसंद

क्यों है मोदी ८७% हिन्दुओ की पहली पसंद 

और अडवानी को ६% हिन्दू ही पसंद करते है, कारन जानिए..इसे पढ़े..

  • १-मोदीजी की छवि एक कट्टर हिन्दू नेता की है और इमानदार होने के साथ साथ विकास पर काफी ध्यान दिया है.
  • २-मोदी के राज में लूट पात चोरी, गुंडागर्दी, दंगा नहीं हो रही है. जो कुछ हो रहा है उसके लिए भी कंग्रेस जिम्मेदार है.
  • ३-मोदी का कम बोलना और राष्ट्रप्रेमी होना, ढोग न करना और कड़े निर्णय लेना उन्हें अडवानी पर बढ़त देता है.
  • ४-अडवानी का कालेधन मुद्दे पर सोनिया से माफ़ी मागना और जिन्ना को सेकुलर बताना बहुत भारी पड़ा है और वह मात्र ६% हिन्दुओ की पसंद है.
  • ५-अडवानी की बातो में साफगोई न रहना और मोदी के लिए रास्ता कठिन करने की वजह से भी अडवानी की लोकप्रियता हिन्दुओ के बीच बहुत घटी है.
  • ६-बीजेपी में पिछले २ साल से मोदी ही हिन्दुओ के लिए पीएम के दावेदार है और उसके बाद सुसमा स्वराज का नंबर आता है.
  • ७-अडवानी हिन्दुओ को भरमाते है जबकि मोदी बहुत काम बोलकर भी भारत के पीएम पद के सबसे सशक्त दावेदार है.
  • ८-अडवानी का सोनिया से दोस्ती भी हिन्दुओ को रास नहीं आ रहा है, जबकि सोनिया मोदी से बहुत डरती हैं.
  •  ९-मोदी भारत के नौजवानों की पहली पसंद है और भारत को कड़क प्रधानमंत्री चाहिए. कांग्रेस का मोदी विरोध मोदी की लोकप्रिय होने का एक और कारन है.
  • १०-मोदी का संघ का पहली पसंद होना मोदी की सबसे बड़ी ताकत है और मोदी भारत स्वाभिमान की पहली पसंद है. जबी जुबान से मुस्लिम तबके द्वारा मोदी को अडवानी से ज्यादा पसंद किया ज़ा रहा है. गोधरा कांड के बाद गुजरात में कभी भी कर्फु नहीं लगा है न दंगे ही हुए है.
  • ११-अडवानी का फर्जी सेकुलर होना भी मोदी के लिए बढ़त का कारन है. पढ़े लिखे युवा मोदी को ही अपना पीएम चाहते है.
  • १२-पाकिस्तान के प्रति मोदी का कड़ा रवैया अडवानी को निचा दिखने के लिए काफी है. अडवानी की रुख इस बारे में एकदम साफ़ नहीं है, मोदी सीधी कार्यवाही में विश्वास करते है.
  • १३-मोदी शराब, वेश्यावृत्ति और गौ-हत्या के प्रखर विरोधी है जब की अडवानी भाषन्बाजी में ही माहिर है. वह मुद्दे को पाले रखना चाहते है जैसे मंदिर मुद्दा..

  • १४-नेहरू खानदान का मुस्लिम कनेक्शन और सोनिया/ राहुल का इसाई होना भी मोदी पर हिन्दुओ का विश्वास बढ़ने का एक स्थाई कारन है,
  • १५-भारत के ८७% युवा मोदी की राष्ट्रवादी छवि के कायल है और भारत स्वाभिमान के आन्दोलन ने मोदी की स्वीकार्यता में बढ़त की है.
भारत के असली प्रधानमंत्री दावेदार की घोषणा तो २०१४ में होनी है बाकि सब रिहर्सल और भ्रम है आप खुद समझ सकते है अगले वास्तविक पीएम कौन है–पक्का मोदीजी ही हैं..

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पहले तो कुरानमें से महम्मद के बारेमें लिखे गये खराब वर्णन या प्रसंग को निकलवा दो

आग्रह को स्वीकार करते हुए उस ब्लॉग को पढ़ा जिसमे श्री राम राज्य के बारे में पूर्णतया अंट शंट बाते लिखी गयी है. उसको मैंने पढ़ा और कमेन्ट भी किया लेकिन जब निचे कमेन्ट पढ़ा तो मुझे वो ज्ञान के भण्डार लगे अतः मैने सोचा की क्यों न आप लोगो तक उस हरामखोर का ब्लॉग और उस पर दिए गए कुछ चुनिन्दा और अच्छे जबाब आपके पास प्रेषित करू..अतः मै उसे संकलित करके आप पाठक बंधुओ के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हु ..
मुल्ले द्वारा लिखा ब्लॉग..
आजकल कुछ तथाकथित भ्रष्ट नेता अध्यात्मिक चोला ओढ़कर ,देश की बहुसंख्यक जनसँख्या को प्रायोजित करते हुए , धार्मिक उन्माद और विद्रोही पैशाचिक हिंसा के लिए प्रेरित करते हुए ,देश में धार्मिक वितृष्णा,और अलगावबाद का धुंआ फैला रहे हैं.
ये लोग एडोल्फ हिटलर की तर्ज पर नाज़ीवाद/नस्लवाद/शुद्द आर्यन जातिवाद जैसा उग्र और हिंसक अभियान चलाकर देश से “अल्पसंख्यक नस्लों/जातियों/धर्मों को समूल समाप्ति” का “दिव्यस्वप्न” देख रहे हैं,और एक पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत ये भारत में “पुन: राम राज्य स्थापना” के महान धार्मिक कार्य के लिए लोगों को सम्मोहित करते उन्हें हिंसा और हत्या जैसे जघन्य पाप करने के लिए उकसा रहे हैं.
अब हम वास्तविक राम राज के विषय में विचार करते हैं,जहां एक घाट पर सिंह और बकरी आदि एक साथ पानी पीते थे,उस राज में जानवरों की सोच और जीवन शैली इतनी अहिंसक और शांतिपूर्ण थी,ऐसे राम राज को लाने के लिए हम हिंसा,हत्या और अत्याचार को माध्यम बना रहे हैं,क्या हम हिंसा के बल पर पहले जैसा राम राज प् सकते हैं? शायद कभी नहीं.
इनकी सोच में “राम राज” एक हिंसक और विघटनकारी राज रहा होगा .शायद वैसा राम राज,जहां एकलव्य को अपनी ऊँगली इसलिए गुरु दक्षिणा में देनी पड़ती है,क्योंकि वो अछूत और निम्न वर्ग से सम्बंधित था.
ऐसा राम राज जहां अस्पृश्य और अछूत जातियों को अलग बर्गीकृत किया जाता था,उन्हें मंदिरों में प्रवेश वर्जित हो ,वेदों के शव्द सुनने का अधिकार न हो,यदि सुन लें तो उनके कानों में पिघला सीसा दाल दिए जाने जैसे दंड विधान हों.जहाँ सत्य के लिए शम्बूक को गर्दन कटानी पड़ जाए.
ऐसा राम राज्य जहां रावण का प्रचंड प्रकोप हो,स्त्रियों का खुलेआम अपहरण करे,और जहां अपनी ही स्त्री को पाने के लिए,एक भीषण युद्ध करना पड़े,जहां स्त्रियों की अस्मिता और सुरक्षा सदैव दांव पर लगी हो.जहां राक्षस हों,दैत्य हों,सूपनखा हो,रावण हों और असुरों का बोलबाला हो.
क्या ऐसा राम राज हो? जहां एक भगवान् एक स्वर्ण मृग की मारीचिका को पहचानने में अक्षम हो,स्वर्ण मोह में उस मृग को पाने के लिए दौड़ पड़े,और जंगल में अपनी स्त्री को असुरक्षित छोड़ जाने में भी किंचित संकोच न करे.बस भाग पड़े,सोने की चाह में.
ऐसा राम राज,जहां खुद भगवान् की स्त्री सुरक्षित नहीं,उसका अपहरण कर लिया जाए,भगवन अपनी स्त्री की सुरक्षा न कर सके………….और एक धोभी के लांछन को सुनकर अपनी निष्पाप स्त्री को अकेला घर से निकाल दे.
एक भगवान् सोना जैसी भौतिक वस्तु को पाने के लिए दौड़ पड़े,अपनी स्त्री को जंगल में असहाय छोड़कर,……………..यदि स्वर्णमृग के पीछे भागने में भगवान् का मोह मात्र सोना पाने की अदम लालसा न भी रही हो,तो दूसरा उद्देश उसका शिकार मांस के लिए करना रहा होगा…………….ऐसा राज जहां भगवान् खुद जीव हत्या या जीवों के प्रति हिंसा पर उतारू हो…..वो राम राज चाहिए इन्हें.
पर यहाँ ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है,कि “राम राज्य” कैसा था,यहाँ मेरा उद्देश्य किसी धर्म अथवा समुदाय के प्रति बुरी भावना,अथवा नकारात्मक सोच रखने से नहीं है,मै विश्व के सभी धर्मों के प्रति पूरी निष्ठां,आस्था और सम्मान रखता हूँ,मेरा विचार है,कि विश्व का कोई भी धर्म बुरा नहीं है,सभी धर्म मानव कल्याण और शान्ति का समर्थन करते हैं,विश्व के किसी भी धर्म में ,दुसरे धर्मों के प्रति अनादर,विद्वेष,वितृष्णा का भाव नहीं है.
किसी भी धर्म के नियम सिद्धांत ,दूसरे धर्म के लोगों की हत्या करना,उन्हें यातना देना,उनकी संपत्तियों को नुक्सान पहुंचाने का समर्थन नहीं करते,और सभी धर्मों को यदि गंभीरता पूर्वक अध्यन किया जाए,तो एक अद्भुद और अप्रत्याशित परिणाम मिलता है,कि सभी धर्मों का मूल उत्पत्ति एक ही स्थान और उद्देश्य से है,सभी एक दूसरे से जुड़े हैं,अथवा आश्रित हैं.

ये उस हरामखोर की लेखनी है इतना पढ़कर आप लोग उसकी मानसिक स्थिति जान गए होंगे पर मै राष्ट्रवादी मित्रो का जबाब अब प्रेषित करता हु..
सबसे अच्छा जबाब श्री वासुदेव त्रिपाठी जी ने दिया है जो निम्नवत है..
एक कहावत कहते हैं- आसमान की ओर मुंह करके थूकोगे तो थूक आकर मुंह पर ही गिरेगा…!! ये कहावत यदि कभी सुनी होती तो शायद आप आसमान पर थूकने की मूर्खता नहीं करते। रामराज्य की स्थापना करने वाले सभी धर्मों के नाश का सपना देखते हैं…, दारुल-इस्लाम जिनकी आस्था का केंद्र हो उनके मन में रामराज्य को लेकर यह भय बैठना स्वाभाविक ही है। स्त्री का अपहरण और युद्ध रामराज्य मे नहीं रावणराज्य मे हुआ था और उस रावण राज्य का अंत करके रामराज्य की स्थापना हुई थी। बाकी धर्म संबंधी व्याख्या उस व्यक्ति से करना मूर्खता होगी जिसे एकलव्य और स्वर्णमृग तक के विषय में मउआ-मूरी कुछ नहीं पता… दुनिया तो नहीं दिखाई देगी लेकिन दुनिया देखने के आँखें और प्रकाश होना आवश्यक है यह नीचे कुछ मित्रों ने स्पष्ट कर दिया है।
रामराज्य का अर्थ सदैव रावणराज्य का अन्त करना रहा है और आज भी है। इसका किसी जाति या व्यक्ति से बैर नहीं है। इसका बैर गजनवी जैसे उन हत्यारों से है जो अरब की लुटेरी मानसकिता लेकर आते हैं और यहाँ हजारों सोमनाथ तोड़कर लाशों को रौंदते हुए लूट का सामान ऊंटों पर भरकर अल्लाह-हु-अकबर चीखते हुए चल देते हैं, अथवा तैमूर जैसे उन लुटेरों से रामराज्य का वैर है जो गाँवों मे आग लगाकर की गयी लूट से अमीर बनने का ख्वाब लेकर आते हैं। रामराज्य का विरोध मोहम्मद गोरी जैसे दगाबाजों और सिकंदर लोदी जैसे भेंडियों से भी है। रामराज्य बाबर जैसे जिहादियों का भी घोर शत्रु है मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाना जिनका दीन रहा है। अकबर जैसे मीनाबाजारी छिछोरे बलात्कारी, गुरु का सर कटवा लेने वाले नराधम जहाँगीर अथवा गुरु के दो मासूम बच्चों को जिंदा दीवार मे चुनवा देने वाले औरंगजेब जैसे दरिंदे भी इस रामराज्य को झेल नहीं सकते। ऐसे मे रामराज्य से उनके पेट मे दर्द होना स्वाभाविक ही है जो आज भी इन नरधमों को अपना नेता आदर्श, मसीहा मानते हैं।
रामराज्य तो प्राणिमात्र के परस्पर प्रेम की कहानी है जिसे “सब नर करहि परस्पर प्रीती” जैसे शब्दों मे गाया जाता है… इसे वे कैसे सहन कर सकते हैं जिनके लिए एक किताब ही आखिरी दीवार हो जिसके पार देखना, उनके लिए दोज़ख की आग मे जाना है। आप इनकी आयतों पर विश्वास नहीं करते या कर पाते तो ये आपको दोज़ख की आग मे हमेशा के लिए जलाने की धमकी देते हैं (कुरान- अल-बकरा 24/126/161/162… आले-इमरान 10-12… अल-निसा 51-57… अल-आराफ़ 40)। आपको ये चिंता सता रही है कि खुदा को सोने के हिरण से मोह कैसे हो गया… जबकि ऐसा हुआ नहीं इसका प्रमाण स्वयं रामायण ही है, और यदि आपको फिर भी लगता है तो भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वो खुदा एक आम आदमी का जीवन जीने मे न शरमाता है और न झुँझलाता है। फिक्र थोड़ी उस खुदा पर फरमाइए जो एक खूंखार तानाशाह की तरह चिढ़ उठता है यदि कोई उसे किसी और रूप मे पूजे… किसी और को खुदा मान ले। ये तानाशाह खुदा इतने पर दोज़ख की आग मे भून डालने का फरमान सुना डालता है। उसके लिए हत्या लूट बलात्कार सब कुछ क्षम्य है लेकिन अपनी तानाशाही को चुनौती (शिर्क) बर्दाश्त नहीं… ये सबसे बड़ा पाप है ( सूरा अल-निसा 48)। और ज्यादा तो फिक्र तो आपको तब होनी चाहिए जब ये खुदा यहूदियों-ईसाइयों को मुसलमानों का खुला दुश्मन बताते हुए उन्हें गरियाने मे अल-माइदा जैसे सूरे के सूरे उतार डालता है। काफिरों के कत्ल का हुक्म दे डालता है… यही नहीं उनके माल को भी लूटने का आदेश देता है। गनीमत का माल कही जाने वाली लूट को कुरान मे जगह जगह हलाल (जायज़) कहा ही गया है, इसे लेते भी कैसे थे… tabari (8-122) देखिये- मुहम्मद ने बंधक बनाए गए खैबर के मुखिया से माल उगलबाने के लिए आदेश दिया कि इसे तब तक प्रताड़ित करो जब तक ये बता न दे इसके पास क्या है। जुबैर ने उसकी छती पर जलती हुई आग रख दी जब तक वो मर नहीं गया.! तब अल्लाह के पैगम्बर ने उसे मुसलमानो को दे दिया जिन्होंने उसक सर काट डाला।
धोबी के लांछन को सुनकर राम ने सीता को निकाल दिया इतना तो आपने वाल्मीकीय रामायण से उठाकर कुछ मुल्ले-मौलवियों या सेकुलरिस्टों से सुनकर रख दिया लेकिन उसके बाद की कहानी कहने क्या एक और नबी उतरेंगे.?? अगर इतनी ही कहानी मे रहना चाहते हैं तो भी चलिए श्रीराम ने प्रजाहित मे अपनी पत्नी के साथ अन्याय किया इतना ही तो कह सकते हैं आप?? अब थोड़ी उसकी भी फिक्र कर लीजिए जब अपने मुंह बोले बेटे जैद की बीबी पर खुदा के फरिश्ते का दिल आ जाता है और अल्लाह फौरन आयत नाज़िल कर देता है जैद की बीबी जैनब अब जैद को हराम और पैगम्बर को हलाल हो जाती है। यहाँ मैं किसी तरह सीमा उल्लंघन नहीं कर रहा हूँ… आपको पता ही होगा यह सूरा अल-अहज़ाब आयत 37-39 की कहानी है जिसमे अल्लाह अपने रसूल की दिल की बात प्रकट करता है। यहाँ तक भी गनीमत थी… लेकिन जंग में औरतों को बतौर लूट और गनीमत का माल उठा ले आना और उन्हें रखैल बनाकर संभोग करना या फिर बेंच देना कितना जायज़ है..?? जंग मे हाथ लगी 17 साल की खैबर औरत सैफीया के बारे मे तो सहीह बुखारी (5:59:512) कहती है- पहले वो दहया के हिस्से में गई थी लेकिन फिर उसे अल्लाह के रसूल ने ले लिया था। सैफ़िया के बदले उसे 9-10 साल की सैफ़िया की दो भतीजी दे दी गईं थी ऐसा सहीह मुस्लिम बताती है। कुरान सूरा अल-निसा आयत 24 भी तो खुली जंग मे हाथ लगी औरतों के उपभोग की छूट देती है भले ही वे विवाहित हों.! आपको ये सोचकर भी उस खुदा की मानसिकता के बारे में चिंता नहीं होती कि ये आयत कैसे उतरी थी.? हदीस अबू-दाऊद (2150) बताती है कि ये आयत तब उतरी जब मुसलमानों ने अल्लाह के पैगम्बर से जंग मे हाथ लगी औरतों के उनके बन्दी पतियों के सामने संभोग करने की इच्छा जाहिर की। खुदा ने पर्मिशन दे दी ऐसे बलात्कार की और आपको ऐसे खुदा पर सोच नहीं आया..?? सहीह मुस्लिम (किताब 8, आयत 3371) मे मुसलमान अल्लाह के रसूल से पूंछते हैं कि हमने कुछ बेहतरीन अरब औरते बंधक बनाई हैं, हम चाहते हैं कि हम उनके साथ अज्ल (बाह्य वीर्यपात) संभोग करना चाहते हैं ताकि वो गर्भवती न हों क्योंकि हम उन्हें बैंचकर दाम चाहते हैं। (रसूल ने अज्ल से तो मना किया {इसीलिए मुसलमान गर्भनिरोध नहीं करते और जनसंख्या बिस्फोट करते जा रहे हैं} लेकिन बंधक औरतों के साथ संभोग या बैंचने से नहीं! क्योंकि यह लूट का हलाल माल था, इन्हें लौंडी कहते हैं। यह शब्द मेरा नहीं कुरान का है)
….क्षमा चाहता हूँ मित्र..!! मैं आपके लेख से बड़ी प्रतिकृया लिख गया… देखा तो रुकना पड़ा… वरना जानकारी तो अभी बहुत बाकी है… जैसे संभोग करने से मना करने पर औरत को फरिश्तों द्वारा शाप दिया जाना (बुखारी)… उसे कमरे मे बंद कर देना… मारना (कुरान अल-निसा, 34)..! अमूमन मैं राजनैतिक मुद्दों पर ही बोलता हूँ, सम्प्रदायगत बहस मे पड़कर लोगों की आँखें खोलकर दिल तोड़ता नहीं हूँ किन्तु फिर भी आप जबाब मे मुझे मेहर और हिस्सेदारी की दूकानदारी मत बताइएगा…. या फिर अपना कोई जाकिर नाइक स्टाइल का जोड़-तोड़…क्योंकि मैंने सूरा-बकरा की आयत 106 भी पड़ी है और मुझे ये भी पता है तक़या क्या होता है। रामराज्य कभी भी नस्ल के आधार पर कत्ल की नहीं सोच सकता क्योंकि गोरी-गजनी के दीवाने आज भले ही शरीयत का शोर मचा रहे हों किन्तु फिर भी वे हमारी ही नस्ल के हैं जिहादी अत्याचारियों ने जिनके बापों की गर्दन पर तलवार रखके अथवा माँओं को गनीमत का माल समझकर बलात्कार के द्वारा मुसलमान बनाया था। दमिश्क मे आज भी एक खंभे पर लिखा है कि यहाँ हिन्दुस्तानी औरतें 2-2 दीनार मे बेंची गईं। रामराज्य तो नस्ल क्या मनुष्य मात्र के परस्पर प्रेम का साक्षात्कार है- “बयरु न कर काहू सन कोई” और “सब नर करहिं परस्पर प्रीती”
…साभार!!
इसके बाद मैंने भी अपनी अल्प बुद्धि से जबाब देने की कोसिस की जो की निम्नवत है..
सर्व प्रथम आप ने कहा की राम राज्य में एकलव्य की अंगुली कटी गयी.. हसी आती है आप के ज्ञान पर.. और वैसे भी द्रोणाचार्य कभी हिन्दुओ के सम्माननीय नहीं रहे ..
फिर कहा की एक सुदर को वेद पाठ सुनने पर उसके कान में सीसा डाला गया .. ये बात न तो बाल्मीकि रामायण में है न ही राम चरित मानस में है ये पेरियार की लिखित तमिल रामायण में है अतः लगता है की आपने रामायण तो कभी पढ़ी नहीं बल्कि उसका क्रिटिक्स पढ़ा है..
तीसरा आप ने कहा की श्री राम ने स्वर्ण मृग के कारन अपने पत्नी को असुरक्च्चित छोड़ दिया ये भी आप के अल्प ज्ञान को दर्शाता है राम उस मृग के पीछे से जाने से मन कर रहे थे पर माता सीता के असीम अनुरोध पर उनकी इच्छा के कारन उस मृग के पीछे गए
चौथी बात आप ने कही की वो खुद राजा थे और अपनी पत्नी को नहीं बचा पाए परन्तु आपकी नीच बुद्धि में ये बात मई डाल दू की उस समय न तो वो राजा थे न राजकुमार वन में आदिकालीन जीवन बिता रहे थे और साधन हिन् होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी पत्नी को बचने के लिए युद्ध किया ..
फिर आपने लिखा की एक औरत के लिए उन्होंने इतना बढ़ा युद्ध किया किन्तु मामला एक औरत का नहीं होता यदि एक औरत के अपहरण पर आप चुप रहेंगे तो अगले दिन अगली औरत का अपहरण होगा इसलिए आप की ये बात विवेकशील ज्ञान से परे है..
फिर आप ने लिखा की भारत में सुद्रो को बहुत परेशां किया गया है.. लेकिन आपको याद दिला दू की भारत में महाभारत को लिखने वाले द्वैपायन व्यास जन्म से सुदर थे पर महान ब्रह्मण का दर्ज़ा उन्हें मिला…
रामायण के रचयिता श्री बाल्मीकि जी भी जन्म और कर्म से पहले सुदर थे पर बाद में महान ब्रह्मण का दर्ज़ा मिला
भारत में शंकराचार्य परंपरा के जनक श्री आदि शानाकराचार्य के गुरु वाराणसी के चंडाल नरेश थे
महान कृष्णभक्त आदरणीया मीरा बाई के गुरुदेव संत रविदास जी थे वो भी एक सुदर थे जबकि मीरा बाई राजपरिवार की थी..
अतः आप जान बुझकर उलटी पुलती बाते न करे भारत में सुदरता की जन्म आधारित शुरात करने वाले मुल्ले है .. सन ८०० से पहले पूर्णतया कर्म आधारित व्यवस्था थी उदहारण के लिए
सम्राट चन्द्रगुप्त सम्राट अशोक महेंद्र इत्यादी जाती से कोइरी थे पर राजा बने
सम्राट आदिगुप्त समुद्रगुप्त कुमार गुप्त जाती से वैश्य थे पर सन ७०० तक राजा रहे …
अतः झूठ का प्रचार और प्रसार बंद करो…. वैसे तुम मुल्ला लग रहे हो और मुल्लो में झूठ बोलना धर्म में शामिल है जिसे ताकईया कहते है सायद तुम उसी काम में लगे हो….

इसके बाद श्री दिनेश जी ने कमेन्ट किया है जो निम्नवत है…
धर्म न माने आपका, उसका कर दो कत्ल।
हमें खुदा ने किसलिये, दी है ऐसी अक्ल??
पाप करो पाओ क्षमा, बढ़ेंगे निश्चित पाप।
न्यायी कैसे बन गये, अरे खुदा जी आप।।
पहिले भारी पाप कर, फिर ले माफी माँग।
धर्म ग्रन्थ में है लिखा, खुदा करेगा माफ।।
लेकर तेरे नाम को, शत्रु दुख, ले प्राण।
नाम खुदा का कर रहे, वह पापी बदनाम।।
दिल में मुहर लगाय के, पापी दिया बनाय।
दोष नहीं कुछ जीव का, पापी खुदा कहाय।।
जो उसके अनुयायी हैं, बस उसको उपदेश।
मारो, काटो, लूट लो, दूजे मत के शेष।।
क्षमा पाप से यदि करे, सब पापी बन जाय।
इसीलिये संसार में बढ़ हुआ अन्याय।।
करे प्रसंशा स्वयं की, वह कैसा भगवान।
मुझको तो ऐसा लगे, खुदा में है अभिमान।।
मेरे मत के लोग ही, जा पायेंगे स्वर्ग।
दूजे मत के वास्ते, बना दिया क्यों नर्क?
दूजे मत अनुयायी जो, काफिर देंय पुकार।
ऐसे तो बन जायगा, काफिर यह संसार।।
जिसको चाहे दे दया, जिसपर चाहे क्रोध।
पक्षपात यदि जो करे, नहीं खुदा के योग्य।।
मारा मेरे भक्त को, दोजख में दे डाल।
मारे मेरे शत्रु को, स्वर्ग जाय, तत्काल।।
दुष्ट हो अपने धर्म का, उसको मित्र बनाय।
सज्जन दूजे धर्म का, उसके पास न जाय।।
दूजे मत का इसलिये, उसको दिया डुबाय।
जो उसके अनुयायी हैं, उसको पार कराय।।
करवाये भगवान सब, पुण्य होय या पाप।
फल क्यों न पाये खुदा, चाहे हो अपराध??
पक्षपात कहलायगा, फल यदि खुदा न पाय।
क्षमा खुदा को यदि मिला, तो यह कैसा न्याय।।
जिस फल से पापी बने, लगा दिया क्यों वृक्ष।
जिसके खाने के लिये, बात नहीं स्पष्ट।।
यदि स्वयं के वास्ते, तो कारण बतलाय।
आदम से पहिले उसे, खुदा नहीं क्यों खाय।।
बारह झरने थे झरे, शिला पे डण्डा मार।
ऐसा होता अब नहीं, क्यों विकसित संसार??
निन्दित बंदर बनोगे, कहकर दिया डराय।
झूठ और छल खुदा जी, आप कहाँ से पाय।।
हुक्म दिया औ हो गया, कैसे हुआ बताय।
किसको दिया था हुक्म ये, मेरी समझ न आय।।
पाक स्थल जो बनाया, क्यों न प्रथम बनाय।
प्रथम जरूरत नहीं क्या, या फिर सुधि न आय।।
नहरें चलती स्वर्ग में, शुद्ध बीबियाँ पाय।
इससे अच्छा स्वर्ग तो, पृथ्वी पर मिल जाय।।
कैसे जन्मी बीबियाँ, स्वर्ग में, आप बताय।
रात कयामत पूर्व ही, उन्हे था लिया बुलाय।।
औ उनके खाविन्द क्यों, नहीं साथ में आय?
नियम कयामत तोड़कर, किया है कैसा न्याय??
रहे सदा को बीबियाँ, पुरुष न रहे सदैव।
खुदा हमारे प्रश्न का शीघ्र ही उत्तर देव??
मृत्य को जो जीवित करे, औ जीवित को मृत्य।
मेरा यह है मानना, नहीं ईश्वरीय कृत्य।।
किससे बोला था खुदा, किसको दिया सुनाय?
बिना तर्क की बात को, कैसे माना जाय?
खुदा न करते बात अब, कैसे करते पूर्व??
तर्कहीन बातें बता, हमको समझे मूर्ख।।
हो जा कहा तो हो गया, पर कैसे बतलाय?
क्योंकि पहिले था नहीं, कुछ भी खुदा सिवाय।।
बिना तर्क की बात को, कैसे माना जाय??
तौबा से ईश्वर मिले, और छूटते पाप।
इसी सोच की वजह से, बहुत बड़े अपराध।।
ईश्वर वैदक है नहीं, यह सच लीजै मान।
सच होता तो बोलिए, क्यों रोगी भगवान??
जड़ पृथ्वी, आकाश है, सुने न कोई बात।
क्या ईश्वर अल्पज्ञ था, उसे नहीं था ज्ञात??
बही लिखे वह कर्म की, क्या है साहूकार?
रोग भूल का क्या उसे, इस पर करें विचार??
आयु पूर्व हजार थी, अब क्यों है सौ साल?
व्यर्थ किताबें धार्मिक, मेरा ऐसा ख्याल।।
सच सच खुदा बताइये, क्यों जनमा शैतान?
तेरी इच्छा के विरुध, क्यों बहकाया इंसान??
बात न माने आपकी, नहीं था तुमको ज्ञात।
तुमने उस शैतान को, क्यों न किया समाप्त??
मुर्दे जीवित थे किये, अब क्यों न कर पाय?
मुर्दे जीवित जो किये, पुनर्जन्म कहलाय।।
कहीं कहे धीरे कहो, कहते कहीं पुकार।
यकीं आपकी बात पर, करूँ मैं कौन प्रकार??
अपने नियम को तोड़ दे, मरे मैं डाले जान।
लेय परीक्षा कर्म की, कैसा तूँ भगवान??
हमें चिताता है खुदा, काफिर देय डिगाय।
कैसे ये बतला खुदा, तूँ सर्वज्ञ कहाय??
बिना दूत के क्या खुदा, हमें न देता ज्ञान?
सर्वशक्ति, सर्वज्ञ वह, मैं कैसे लूँ मान??
बिना पुकारे न सुने, मैं लूँ बहरा मान।
मन का जाने हाल न, कैसा तूँ भगवान??
व्यापक हो सकता नहीं, जो है आँख दिखाय।
वह जादूगर मानिये, चमत्कार दिखलाय।।
पहुँचाया इक देश में ईश्वर ने पैगाम।
ईश्वर मानव की कृति लगता है इल्जाम।।
श्री भरोदिया जी ने भी अपने अपने कमेन्ट को इसमें शामिल करने का आग्रह किया है अतः मै उसे भी आप लोगो के सम्मुख रख रहा हु
सैमा बहेन नमस्कार
पहले तो मैं आप को दाद देता हुं की आप समाज को सुधारने का जजबा रखती है, वरना बूरके में कैद करनेवाले समाज में ये बहुत मुश्कोल हो जाता है । धर्म समाज का बहुत बडा अंग है । और धर्मों को सुधारना जरूरी भी है ।
लेकिन शरुआत हमेशां घर से करनी चाहिए । अपना घर पहले सुधर जाए तो दुसरे घर को सुधारना आसान बन जाता है । कोइ ताना तो ना मारे पहेले आपना संभाल ।
आप को एक बात बताना चाहुंगा । भारत की बात नही है, विदेश का एक मुल्ला ईस्लाम से तंग आकर ख्रिस्ति बन गया । क्यों की वो मुल्ला था तो कुरान असली भाषामें पढ सकता था. उसने शब्दसः अंगेजीमें अनुवाद कर दिया । पूरा का पूरा कुरान नेट पर रख दिया । कोमेंट देनेवालों ने गालियों की बौछार कर दी । कुरान में ऐसे खराब प्रसंग होते हैं किसी को मानने में नही आ रहा था । या तो मान के भी अंधश्रध्धा के कारण विरोध कर रहे थे ।
बहेन जी, पहले तो कुरानमें से महम्मद के बारेमें लिखे गये खराब वर्णन या प्रसंग को निकलवा दो । वो सब लिखा गया था तब प्रजा बहुत ही जाहिल थी आज के मुकाबले । लिखते समय सामाजिक परिस्थियां रही होगी । और लिखने वाले आज के मुल्ला के मुकाबले बहुत ही पिछडे हुए थी । वो पूराने थे तो ईसी वजह से अहोभाव मे आ कर सर पे नही बैठाया जा सकता । हर काल खंडमें मौजुदा मुल्ला ही सही साबित हो सकता है । उन की ही जिम्मेदारी होती है धर्म को सही दिशा देने की । हम या आप कुछ नही कर सकते ।
हालांकि ये मूल लेखन नहीं है और मैंने बिना पूछे लोगो के विचार यहाँ पर संकलित किया है अतः उन लोगो से माफी परन्तु ज्ञानवर्धक लगा इसलिय पोस्ट कर दे रहा हु…..अन्त में मै उस मुल्ले लेखक का नाम भी लिख दे रहा हु जिसकी बदौलत उसके पैगम्बर की इज्जत उसी के ब्लॉग पर डूब गयी..MALIK SAIMA …

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वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय एकता के शिल्पी

इतिहास कैसे रचा जाता है इसका इतिहास जानने के लिए भारत में वल्लभ भाई पटेल का प्रयास प्रत्यक्ष प्रमाण है। संकल्प, साहस, सूझ-बूझ के धनी पटेल ने तत्कालीन 565 से भी अधिक देशी रियासतों का भारत मे विलीनीकरण करके राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार के रूप में इतिहास रच दिया है। भारत को सुदृढ़ बनाना उनका सपना था।

जिसे प्रज्ञा और पुरूषार्थ से उन्होंने साकार कर दिया। राष्ट्रीय एकता के शिल्पी के रूप में समय स्वयं उनके कृतित्व के चंवर डुलाता है और इतिहास उनके व्यक्तित्व को पलकों पर बैठाता है। उनकी प्रकृति में पुरूषार्थ, संस्कार में स्वाभिमान, सोच में सार्थकता और संवाद मे स्पष्टवादिता थी। मंदिर पर कलश की तरह उनका कृतित्व और बर्फ की चट्टान में आग की तलवार की तरह व्यक्तित्व था। सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था। उनके पिता झबेर भाई बोरसद ताल्लुका के करमसद गांव के निवासी थे। वे पेशे से साधारण किसान थे। उनकी माता लाड़बाई तथा पिता ने साहस, सच्चाई और सादगी के संस्कार तो सिखाए ही पुरूषार्थ और पराक्रम का पाठ भी पढ़ाया। प्रारंभ में प्रांतीय किसान नेता के रूप में तथा आगे चल कर देश के दिग्गज और दिलेर नेता के रूप में वे अपने फौलादी व्यक्तित्व के कारण लौह पुरूष कहलाए।

15 दिसंबर 1950 को उनका स्वर्गवास हो गया। सरदार पटेल असत्य के आलोचक और सत्य के समर्थक थे। कितना ही शक्तिशाली व्यक्तित्व क्यों न हो अगर वह अहंकारी व अन्यायी होता तो उसे मुंह पर फटकारने का पटेल में गजब का नैतिक साहस था, लेकिन स्वयं से गलती होने पर स्वीकारने की अद्भुत गुण भी उनमें था। उदाहरण के लिए गुजरात क्लब के आमंत्रण पर जब महात्मा गांधी व्याख्यान देने आए तो पटेल ने गांधी जी की उपेक्षा करते हुए कहा मैं इस प्रकार सत्‍यागृहीयों को समर्थन नहीं करता हूं

ये लोग अंजीनिर्वासी करके परम शक्तिशाली ब्रिटिश शासन को यहां से उखाड़ फेंकेगे मुझे इसमें बहुत संदेह है।” लेकिन कालांतर में चंपारण जिले में गांधी जी द्वारा जा रहे सत्‍यागृह को देखकर चमत्कृत और अभिभूत हो गए थे। तब से वे गांधी जी कीआंदोलन पद्धति के प्रशंसक और भक्त बन गए थे। यही कारण था कि उन्होंने सत्याग्रह के महात्मा गांधी के दर्शन को क्रांतिकारी निरूपित किया। उन्होंने खुद सत्याग्रह के कई प्रयोग करके अन्याय व आतंक को ध्वस्त किया। गांधी जी के साथ उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। जिससे उनकी संघर्ष शक्ति और बढ़ गई। नागपुर का झंडा सत्याग्रह, बारडोली का ताल्लुका सत्याग्रह, उनकी ख्याति मे चार चांद लगा गया।
वे टे्रड यूनियन संबंधी सुधारों और आंदोलनों के भी प्रेरणा पुंज थे। जब भारत आजाद हुआ तो जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व मे उन्हें गृह विभाग के साथ-साथ देशी रियासतों का विभाग भी दिया गया। पटेल ने विवेक और- पुरूषार्थो का प्रयोग करके देशी रियासतों का भारत में विलीनीकरण करके भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। यह उनकी दूरदृष्टि और व्यूह रचना का परिणाम था कि जूनागढ़ और हैदराबाद रियासतों का विलय उन्होंने भारत में कराया। हैदराबाद विलय टेढ़ी खीर था, लेकिन पटेल ने अपने अदम्य साहस से वह कर दिखाया।
शेख अब्दुला के प्रभाव में आकर नेहरू जी ने कश्मीर मामले को पटेल के रियासत विभाग से अलग कर दिया। बतौर प्रधानमंत्री नेहरू जी ने कश्मीर को विशेष्ा राज्य के रूप में अपने हाथ में ले लिया था। बाद में कश्मीर के मामले को नेहरू जी संयुक्त राष्ट्र में लेकर गए तब से ही कश्मीर की समस्या सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। पटेल की एक शक्तिशाली सैनिक कार्रवाई कश्मीर समस्या को सदा के लिए सरलता से सुलझा सकती थी। पटेल ने बड़े दुख से कहा था कि “जवाहरलाल और गोपालस्वामी अयंगर ने कश्मीर को व्यक्तिगत विष्ाय बनाकर मेरे गृह विभाग तथा रियासत विभाग से अलग न किया होता तो कश्मीर समस्या उसी प्रकार हल होती जैसे हैदराबाद की।”

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नेहरू का आशिक़ मिज़ाज भारी पड़ा ।

यदि सरदार वल्लभभाई पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने होते तो भारत कश्मीर,आतंकवाद, और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों/ समस्याएं खड़ी ही नहीं होती ।देश का दुर्भाग्य उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन आशिक़ मिज़ाज नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने थे।

राष्ट्रभक्ति की भावनाओं से उनका ह्रदय सराबोर था.दृढ निश्चय और राष्ट्र हित में कुछ भी करने के लिए कृतसंकल्प सरदार पटेल के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग उनके चरित्र का एक पक्ष प्रस्तुत करता है।

सरदार पटेल का सर्व महत्वपूर्ण योगदान था देशी राज्यों का भारतीय संघ में विलय . गृह मंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों(राज्यों) को भारत में मिलाना था। ये दुष्कर कार्य उन्होंने बिना रक्तपात व हिंसा के अपनी बुद्धिमता और कूटनीति के बल पर सम्पादित कर दिखाया।

देश को अखंडता का तोहफा देने वाले सरदार पटेल के साहस ने संभवतः देश के खंड खंड होने से बचाया और उ नके निर्णय देश हित में थे ।राष्ट्र-निर्माता ‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार पटेल को भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हे भारत का लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है।

देश के इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त तेवर के सामने नेहरू का आशिक़ मिज़ाज विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा ।

भारतीय सिविल सेवा के एम ओ मथाई जिन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया. मथाई जी ने एक पुस्तक “Reminiscences of the Nehru Age”(ISBN-13: 9780706906219) ‘लिखी ! किताब से पता चलता है कि वहाँ जवाहर लाल नेहरू और माउंटबेटन एडविना (भारत, लुईस माउंटबेटन को अंतिम वायसराय की पत्नी) के बीच गहन प्रेम प्रसंग था । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और अन्तिम वायसराय लार्ड माउन्टबेटेन की पत्नी एडविना के बीच रोमांस की चर्चा सर्वव्यापी है। एडविना की बेटी पामेला हिल्स ने भी इसे स्वीकार किया।
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भारत की बहुत सी समस्याओं के लिये आशिक़ मिज़ाज जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार माना जाता है। इन समस्याओं में से कुछ हैं:

• लेडी माउंटबेटन के साथ नजदीकी सम्बन्ध
• भारत का विभाजन
• कश्मीर की समस्या
• चीन द्वारा भारत पर हमला
• मुस्लिम तुष्टीकरण
• भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन का समर्थन
• भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देना
• हिन्दी को भारत की राजभाषा बनने में देरी करना व अन्त में अनन्त काल के लिये स्थगन
• भारतीय राजनीति में कुलीनतंत्र को बनाये रखना
• भारतीय इतिहास लेखन में गैर-कांग्रेसी तत्वों की अवहेलना

सन १९६५ के बाद भी भारत पर अंग्रेजी लादे रखने का विधेयक संसद में लाना और उसे पारित कराना : 3 जुलाई, 1962 को बिशनचंद्र सेठ द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू को लिखे गये पत्र का एक हिस्सा निम्नवत है-

राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति सरकार की गलत नीति के कारण देशवासियों में रोष व्याप्त होना स्वाभाविक है। विदेशी साम्राज्यवाद की प्रतीक अंग्रेजी को लादे रखने के लिए नया विधेयक संसद में न लाइये अन्यथा देश की एकता के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।…यदि आपने अंग्रेजी को 1965 के बाद भी चालू रखने के लिए नवीन विधान लाने का प्रयास किया तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

डा. राममनोहर लोहिया ने संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऐशो आराम पर रोजाना होने वाले 25 हजार रुपये के खर्च को प्रमुखता से उठाया था। उनका कहना था कि भारत की जनता जहां साढ़े तीन आना पर जीवन यापन कर रही है उसी देश का प्रधानमंत्री इतना भारी भरकम खर्च कैसे कर सकता है।

एक बार सरदार पटेल ने स्वयं एच.वी. कामत को बताया था कि ”यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीरी मुद्दे को निजी हिफाजत में न रखते तथा इसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह इस मुद्दे को भी देश-हित में सुलझा देता।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज गोपालाचारी ने लिखा-”निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता।

सच में देश को लौहपुरुष की बहुत जरूरत है ,..काश सरदार पटेल प्रधानमन्त्री होते तो देश का हाल कुछ और ही होता ,…..आशिक़ मिज़ाज नेहरू की चाटुकारी नीति आज तक देश को खा रही है ,..कब तक खाती रहेगी ?…पता नहीं

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कालेधन पर संसद में पेश श्वेतपत्र

जिस सरकार को आमतौर पर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आम आदमी के मानवाधिकारों की खास फिक्र नहीं रहती, उसे विदेश में काला धन रखनेवाले खास भारतीयों के मानवाधिकारों के उल्लंघन की भारी चिंता सता रही है। बीते सोमवार को वित्त मंत्रालय की तरफ से कालेधन पर संसद में पेश श्वेतपत्र में कहा गया है कि सरकार ने दुनिया के जिन देशों के साथ दोहरा कराधान बचाव करार (डीटीएए) या कर सूचना विनिमय करार (टीआईईए) कर रखे हैं, वे मानवाधिकारों की रक्षा के लिए ऐसी गोपनीयता पर जोर देते हैं, जिसे भारत ने भी मान्यता दे रखी है। इसलिए इनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

बता दें कि भारत ने इस समय 82 देशों के साथ डीटीएए और 6 देशों के साथ टीआईईए संधियां कर रखी हैं। साथ ही 37 देशों के साथ इस तरह के करार की बातचीत विभिन्न चरणों में है।

97 पन्नों के श्वेतपत्र के 68वें पन्ने पर सरकार ने अपनी बात उदाहरण देकर समझाई है। उसका कहना है कि मान लीजिए कि किसी देश से 100 भारतीयों के बैंक खातों की जानकारी मिलती है। लेकिन इससे खुद-ब-खुद नहीं साबित हो जाता कि ये सारे के सारे 100 खाते भारतीय नागरिकों द्वारा विदेश में रखे कालेधन से जुड़े हों। हो सकता है कि खाताधारी अनिवासी भारतीय (एनआरआई) हो जिस पर भारत में कर नहीं लगता हो और उसने बाहर जमा किए गए धन की सूचना आयकर विभाग को दे रखी हो। जांच व निर्धारण के पूरा होने पर ही पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि किसी भारतीय नागरिक द्वारा विदेशी बैंक खाते में जमा की गई रकम काला धन है या नहीं।

यकीनन बड़ी संवेदनशीलता व जिम्मेदारी का भाव झलकता है वित्त मंत्रालय की इस बात में। लेकिन इसी श्वेतपत्र में मंत्रालय ने डंके की चोट पर कहा है कि भारत से भेजा गया अवैध धन हवाला, गलत मूल्य निर्धारण (आयात-निर्यात की इनवॉयसिंग), प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), भारतीय कंपनियों द्वारा जारी जीडीआर (ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट्स) और भारतीय शेयर बाजार में पार्टिसिपैटरी नोट्स (पी-नोट्स) के जरिए वापस आ सकता है। इस क्रम में पी-नोट्स पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया गया है। बता दें कि पी-नोट्स के जरिए एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) विदेशी निवेशकों का धन हमारे शेयर बाजार में लगाते हैं। इनमें विदेशी निवेशकों की पहचान छिपी रहती है। विदेश में पी-नोट्स की अलग से ट्रेडिंग भी होती है।

हालांकि हमारी पूंजी नियामक संस्था, सेबी का पी-नोट्स की ट्रेडिंग पर कोई अंकुश नहीं है। लेकिन खबरों के मुताबिक उसके पास पूरा रिकॉर्ड है कि पिछले कुछ महीनों में किन-किन लोगों ने पी-नोट्स के जरिए भारतीय शेयर बाजार में निवेश किया है। असल में अक्टूबर 2011 से एफआईआई को अपने हर सौदे का ब्यौरा सेबी के पास जमा कराना होता है। इसलिए वित्त मंत्रालय चाहे तो हर पी-नोट धारक का पता-ठिकाना हासिल कर सकता है। लेकिन उसने सब कुछ जानते हुए भी सेबी से ये जानकारी नहीं मांगी।

हम मान लेते हैं कि डीटीटीए व टीआईईए की शर्तों के कारण विदेशी बैंकों में काला धन रखनेवालों के नाम उजागर करने में दिक्कत आती है। लेकिन पी-नोट्स के जरिए जिन लोगों ने भारतीय शेयर बाजार में धन लगाया है, उनके नाम तो वित्त मंत्रालय जाहिर ही कर सकता था। साफ-सी बात है कि सरकार किसी न किसी बहाने काला धन रखनेवालों की परदादारी में जुटी है। कारण भी बड़ा साफ है कि इनमें बहुत सारे राजनेता, वीवीआईआई व अपराधी किस्म के लोग शामिल होंगे, जिनको छिपाना जरूरी है।

मालूम हो कि काला धन दो ही तरीकों से बनता है। पहला – ड्रग्स, स्मगलिंग, चोरी-डकैती, रिश्वखोरी व भ्रष्टाचार जैसी अवैध करतूतों से। दूसरा – एकदम वैध तरीके से की गई कमाई पर टैक्स न देने से। इसमें दूसरा तरीका ऐसा है जिसे डॉक्टर से लेकर वकील और पान की दुकान व खोमचे वाले तक अपनाते हैं। लेकिन सरकार ने कर-छिपाने के रास्ते इस कदर बंद कर दिए हैं कि इस तरीके से काला धन बनने की गुंजाइश बेहद घट गई है। ऐसे में पहला तरीका ही काले धन का स्रोत बना हुआ है, जिसे हमारी राजनीतिक पार्टियों ने संरक्षण दे रखा है। आपको याद होगा कि श्वेतपत्र आने के बाद बीजेपी नेता जसवंत सिंह का कहना था कि यह बिकनी की तरह है जिसमें सारी जरूरी चीजें छिपा ली जाती हैं और केवल गैर-जरूरी चीजों को उघाड़ा जाता है। बिकनी के उदाहरण से बीजेपी नेता की मानसिकता को समझा जा सकता है।

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संविधान के नाम पर महाझूठ !

संविधान के नाम पर भारत के आम आदमी को बरगलाया गया और देखिये सविधान के नाम पर एक षड्यंत्र के तहत देश को कैसे भ्रमित किया जा रहा है … संविधान के नाम पर महाझूठ (

1. जो सविंधान अंग्रेजो ने ( governemnt of indian act 1935) में हमें लूटने के लिए बनाया गया था उसी को संविधान बनाने वालो ने इधर उधर फेरबदल करके पूरी तरह से अपना लिया !

2.. कहा जाता है की इसको बनाने में 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे .लेकिन हकीकत यह है कि संविधान सभा ने सिर्फ 166 दिन ही सविंधान बनाने के लिए काम किया था .इस हिसाब अगर 8 घंटे /दिन काम हो तो सिर्फ 20 दिन में ही सविंधान बन गया था ! दुनिया का सबसे बड़ा सविंधान सिर्फ 20 दिन में बन गया है ना आश्चर्य की बात ?

3.संविधान के अनुसार भारत धर्मनिरपेक्ष है .लेकिन भारत की परम्परा के अनुसार कोई भी देश धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता है बल्कि पंथ और सम्प्रदाय निरपेक्ष हो सकता है .मनु समृति में धर्म के 10 लक्षण दिए गए है .जो उनको अपनाये धार्मिक है भले ही वो किसी भी धर्म या जाती का हो .क्या संविधान निर्माताओ के पास इंतना भी धर्म का ज्ञान नहीं था जितना मेरे जैसे निकम्मे को है

4.कहा जाता है की संविधान बड़े ही दूरदर्शी और देशभक्त लोगो ने बनाया था .लेकिन अगर बनाने वाले इतने ही दूरदर्शी थे क्यों इसमें महज 62 सालो में 97 संशोधन करने पड़ गए है .रही बात देशभक्ति की तो हिंदी के साथ साथ सविंधान को अंग्रेजी में क्यों लिखा गया क्या भारत में और कोई सम्रध भाषा नही थी जिसमे सविधान लिखा जा सकता था .

5. आदरणीय व् पूजनीय बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी ने 1953 में राज्य सभा में जमकर इस संविधान का विरोध किया था .उन्होंने कहा था की हमारे शहीदों की आशाओं पर ये सविधान खरा नहीं उतर पायेगा इसलिए इसे दुबारा बनाना चाहिए !

हमारा महान संविधान देश के 70 % लोगो के लिए रोटी का इंतजाम नहीं कर पा रहा है बाकी की बाते तो दूर की है .ये देश 12 हज़ार साल तक पवित्र गीता द्वारा दिखाए मार्ग पर चला और विश्व गुरु बनने में कामयाब रहा है .देखिये तो सही 12 हज़ार साल पुराने ग्रन्थ में कही कोई ऐसी बात नहीं जिसका संशोधन किया जा सकें ये है भारत की महान परम्परा जिसको हम भूल गए हैं
धयान रखिये जो दुःख व्यवस्था जनित हो उसको किसी भी प्रकार से दूर नहीं किया जा सकता है .

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क्यों गिरता जा रहा है रुपया डॉलर के सामने ?

 

जिस दौर में डॉलर को कमजोर होना चाहिए उस दौर में रुपया रसातल में जा रहा है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था पंद्रह हजार अरब अमेरिकी डॉलर के कर्ज तले दबी हुई है और अमेरिकी कांग्रेस की सख्ती के कारण घाटे में कटौती के प्रस्तावों को 2021 तक टाल दिया गया है। हकीकत यह है कि अमेरिका दिवालिया होने के करीब है। ऐसे वक्त में भारतीय रूपये की कमजोर होती हालत क्या अमेरिकी अर्थव्यवस्था के घाटे को पूरा करेगी और डॉलर की सर्वोच्चता बनाये रखेगी? अमेरिकी डॉलर की हालत देखते हुए रुपये की कमजोरी हजम नहीं हो रही है।

हमारे प्रधानमंत्री को रुपए की चिंता हो न हो, लेकिन डालर की चिंता उन्हें बहुत रहती है। 23 नवंबर, 2009 को न्यूयार्क की यात्रा के वक्त हमारे प्रधानमंत्री ने मजबूत डालर में सार्वजनिक तौर पर अपना भरोसा जताकर उसे सहारा देने की कोशिश की थी। विश्लेशकों का यह भय कि रुपया प्रति डालर 50 के स्तर को छुएगा, जल्द ही सच हो गया। वाणिज्य मंत्रालय ने तो यह कहकर चैंका दिया कि इस साल व्यापार घाटा 200 अरब डालर को पार कर जाएगा। अब दो सरल सवाल हमारे सामने हैं-

(क) नई आर्थिक नीति के तहत 1991 में जब रुपए के अवमूल्यन की नीति प्रारंभ की गई तो बहाना बनाया गया कि ऐसा भारत के व्यापार संतुलन को ठीक करने के लिए किया गया। सरकार ने आलोचकों को आडे़ हाथों लिया और सभी उपलब्ध मंचों से चिल्ला-चिल्ला कर कहा कि इससे निर्यात सस्ता और आयात महंगा होगा, जिसके चलते भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धी होंगे और आयात को हतोत्साहित किया जा सकेगा। लेकिन रुपए का मूल्य जुलाई, 1991 के प्रति डालर 18 रुपए से गिरकर अब प्रति डालर 50 रुपए तक जा पहुंचा है। इसके कारण व्यापार घाटा 2.7 अरब डालर से बढ़कर 200 अरब डालर के अनुमानित स्तर तक पहुंच गया है। क्या उस समय के नीति निर्माता रुपए के अवमूल्यन की नीति अपनाकर देश को गुमराह करने और देश की अर्थव्यवस्था से जान-बूझकर खेलने के लिए माफी मांगेंगे?

(ख) अमरीका में 2008 के आर्थिक संकट के दौरान जब डॉलर के मूल्य में भारी गिरावट का भय था, उस समय भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपए की स्वाभाविक बढ़त को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार यानी फारेक्स मार्केट में सक्रिय हस्तक्षेप किया और अमरीकी नीति निर्माताओं की मजबूत डालर नीति को समर्थन दिया। अब जबकि कमजोर रुपए के चलते तेल आयात से भारी व्यापार घाटा हो रहा है, जो डालर समर्थित अमरीकी सैन्य नीति के चलते है, क्या भारतीय रिजर्व बैंक फारेक्स मार्केट में एक बार फिर सक्रिय हस्तक्षेप करेगा, जिससे कि रुपए की गिरावट थम सके, जिससे तेल और तेल पर निर्भर भारतीय उपभोक्ता राहत की सांस ले सकें?

हम जानते हैं कि उपरोक्त दोनों मामलों में जवाब नकारात्मक है। भारत की आजादी के बाद विशेष रूप से अगस्त, 1971 में ब्रेटनवुड्स सिस्टम के ढहने के बाद से अब तक डालर की तुलना में रुपए की लगातार हुई गिरावट पर मैं एक नजर डालना जरूरी है।

1950-51 से मध्य दिसंबर, 1973 तक भारत ने पाउंड स्टर्लिंग से जुड़े रुपए की विनिमय दर प्रणाली का अनुसरण किया, ठीक वैसे ही जैसे चीन ने इन दिनों अपनी मुद्रा रेनमिनबी या युआन को अमरीकी डालर के साथ किया है। यह विनिमय दर स्थिर थी और रुपए की किस्मत पाउंड स्टर्लिंग से जुड़ी थी। 1966 और 1971 में जब पाउंड स्टर्लिंग का अवमूल्यन हुआ तो रुपए का दूसरी मुद्राओं की तुलना में फिर से मूल्यांकन किया गया। समस्या तब शुरू हुई, जब निक्सन ने 15 अगस्त, 1971 को सोना-डालर परिवर्तनीयता को समाप्त करने की घोषणा की। वस्तुतः डालर-सोने की परिवर्तनीयता ब्रेटनवुड्स प्रणाली पर आधारित थी, जिसके तहत प्रति औंस सोने की कीमत 35 डालर थी। यह प्रणाली खत्म होने के बाद डालर पूर्ण रूप से एक कागज मुद्रा बन गया।

24 सितंबर, 1975 को पाउंड स्टर्लिंग के साथ रुपए का गठजोड़ टूट गया और वहीं से डालर की तुलना में रुपए के पतन की सतत यात्रा शुरू हुई। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी का निष्कर्ष निकालना गलत होगा। वास्तव में रुपए की कमजोरी हमारी व्यवस्था में काबिज अमरीका-प्रशंसक नीति निर्माताओं की कारगुजारी है। एशिया में अमरीकी दबदबे को बनाए रखने के लिए हमारे लोगों ने ही मजबूत डालर की नीति को बढ़ावा दिया। सोवियत रूस के विघटन और रुपया-रूबल व्यापार की समाप्ति ने डालर-पोषित नीति निर्माताओं को व्यापार घाटा कम करने के नाम पर रुपए की अवमूल्यन की नीति जारी रखने का अवसर प्रदान किया। बड़े नियोजित ढंग से इसका लक्ष्य भारत को कमजोर करना और अमरीकी दबदबे को मजबूत करना था।

आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में भारत की विकास दर में लगभग ठहराव सा था, इसके बावजूद रुपए ने अपनी मजबूती बनाए रखी। 1971 में ब्रेटनवुड्स प्रणाली के ढहने के बाद भी नीति निर्माताओं ने मजबूत रुपए की नीति का अनुसरण जारी रखा। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में यह नीति कमजोर पड़ने लगी। तथाकथित आर्थिक उदारीकरण के दौर में जब भारत में हार्वर्ड-कैम्ब्रिज के नीति निर्माताओं का उदय हुआ तब अचानक ही हालात बदल गए। उदारीकरण के पैरोकारों ने कमजोर रुपए की नीति का अनुसरण किया और भारतीय अर्थव्यवस्था को अमरीकी नीति निर्माताओं की सनक का मोहताज बना दिया।

आखिर डालर ने ऐसी शानदार स्थिति कैसे हासिल की?

अमरीकी अर्थव्यवस्था की बुनियादी सुविधाओं पर विश्वयुद्ध का कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा। उल्टे युद्ध के कारण वहां उत्पादन में तेजी आई। विश्वयुद्ध के समय अमरीका खनिज तेल का सबसे बड़ा उत्पादक था, जो आधुनिक उद्योगों की मूलभूत आवश्यकता है। अमरीका ने कमजोर यूरोपीय शक्तियों को सैन फ्रांसिस्को और ब्रेटनवुड्स में व्यवस्थित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश, विश्व बैंक और गैट को अमरीकी प्रभुत्व स्थापित करने के उपकरण के तौर पर सृजित किया गया। हैरी जे. व्हाइट के सुझावों के अनुसार, डालर-सोने की परिवर्तनीयता की पूर्व शर्त पर डालर अंतरराष्ट्रीय रिजर्व और लेन-देन की मुद्रा बन गया। जान मैनयार्ड कीन्स के बैंक नोट जारी करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। इस समय व्यापार संतुलन अमरीका के पक्ष में बहुत अधिक झुका हुआ था। इसके चलते केंद्रीय बैंक का 60 फीसदी सोना अमरीका ने अपने निजी फेडलर रिजर्व सिस्टम के पास इकट्ठा कर लिया, जो ब्रेटनवुड्स प्रणाली के स्थायित्व की गारंटी का आधार बना।

डालर की इस सर्वोच्चता को पहला झटका 1960 के दौरान लगा। अपने वैश्विक दबदबे का प्रदर्शन करने के लिए अमरीका ने वियतनाम पर आक्रमण किया। इस युद्ध के कारण जो आर्थिक दबाव पड़ा, उसे पूरा करने के लिए अमरीका ने लगातार घाटे का बजट पेश किया। अमरीकी अर्थव्यवस्था भारी भुगतान घाटे और बजट घाटे में चली गई। फ्रांसीसी राष्ट्रपति चाल्र्स डी गाल ने अमरीका को चुनौती देने के लिए यूरोपीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने अमरीका से सोने के बदले में यूरोडालर को परिवर्तित करने को कहा। अमरीका इससे हिल गया। उसे लगा कि यदि अन्य यूरोपीय देशों ने भी कारोबार अधिशेष से संचित यूरोडालर को परिवर्तित करने का निर्णय ले लिया तो फेडरल रिजर्व प्रणाली और डालर की सर्वोच्चता ढह जाएगी। निक्सन ने तब 1971 में सोने-डालर की परिवर्तनीयता समाप्त करने का निर्णय लिया और इस तरह 1974 में ब्रेटनवुड प्रणाली ढह गई। इससे लचीली विनिमय दर प्रणाली का रास्ता साफ हो गया।

स्थिर विनिमय दर प्रणाली के एक बार समाप्त हो जाने के बाद मुद्राओं में वैश्विक कारोबार को गति मिली। पूंजी तब गतिशील हो गई और विभिन्न क्षेत्रों में पूंजीवाद विकसित हुआ। धीरे-धीरे वित्तीय पूंजीवाद उत्पादक दायरों से अलग हो गया। सृजित पूंजी की अत्यंत चंचल प्रकृति ने तीसरे विश्व के देशों को अविकसित उद्योगों में पूंजी आमंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के दबाव के सामने झुकने को मजबूर कर दिया। इस मोड़ पर यूरोप ने स्वतंत्र यूरोपीय मौद्रिक प्रणाली के लिए गंभीरता से प्रयास शुरू कर दिया। उधर अपनी वित्तीय सर्वोच्चता को और मजबूत बनाने के लिए अमरीका के पास अन्य योजनाएं भी थीं।

सन 1973 में ओपेक देशों ने अरब-इजरायल युद्ध के चलते तेल की कीमत को कई गुना बढ़ा दिया। अमरीकी कूटनीतिज्ञ हेनरी किसिंजर ने ओपेक नेताओं से गुप्त बातचीत शुरू कर दी। तेल-डालर धुरी के उदय ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका को अपनी सर्वोच्चता और मजबूत करने का मौका दे दिया। दुनिया में तेल आपूर्ति के चुनिंदा आपूर्तिकर्ता हैं। इनमें से ज्यादातर आपूर्ति डालर के बदले में ही होती है।

इस दुनिया में जहां तरक्की को ईंधन के उच्च उपयोग से मापा जाता है, प्रत्येक तेल आयातक देश को प्रगति के लिए डालर चाहिए। डालर को केवल दो ही तरीकों से पाया जा सकता है, या तो अमरीकी और अमरीका नियंत्रित बहुपक्षीय संस्थाओं से कर्ज के जरिए, या अमरीका को सामानों और सेवाओं के अधिक से अधिक निर्यात से। यह कोई संयोग नहीं है कि आर्थिक विकास का नवउदार दर्शन निर्यात प्रधान विकास पर जोर देता है। मुद्रा अवमूल्यन निर्यात बढ़ाने का पैमाना है, इसे दिखाने के लिए आर्थिक सिद्धांतों में हेरफेर किया जाता रहा है। शेष विश्व, विशेषकर विकासशील देश डालर की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक अवमूल्यन में उतर जाते हैं, ताकि अमरीका में उनकी बाजार हिस्सेदारी बढ़े। परिणामस्वरूप अमरीका सबसे सस्ते दामों पर उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार बन गया है, जिससे वहां उपभोक्ता क्रांति हो पाई। दूसरी ओर पेट्रो-डालर का विशाल भंडार अमरीकी बांड बाजार में दोबारा प्रयुक्त हो जाता है। अमरीका को इस तरह से तीन तरह के लाभ मिलते हैं। एक, अमरीका के चालू खाते का घाटा संतुलित रहता है। दूसरा, अधिशेष पूंजी उन विकासशील देशों को भुगतान घाटे को दुरुस्त करने के लिए बतौर कर्ज में दे दी जाती है, जिनकी अर्थव्यवस्था पूंजी के गतिशील होने के चलते अस्थिर है। तीसरा, अमरीका में शेयरों के मूल्य और संपदा मूल्य अधिकतम रखे जाते हैं, जो अमरीकी अर्थव्यवस्था की भ्रामक मजबूती को दिखाता है। ये तत्व डालर को स्थिर बनाते हैं। डालर की तुलना में अन्य मुद्राओं के अवमूल्यन से डालर की मजबूती बनी रहती है। इसलिए इसकी सर्वोच्चता को चुनौती नहीं मिलती। अमरीकी सर्वोच्चता इस सामान्य तरीके से फलती-फूलती है। वास्तविक भौतिक वस्तुओं के बदले अमरीका केवल आदेशित मुद्रा यानी डालर की अदायगी करता है, जिसे वह 1971 में डालर-सोना परिवर्तनीयता के टूटने के बाद बिना किसी सीमा तक छाप सकता है।

अमरीका अपने घाटे की पूर्ति वैश्विक स्तर पर राजकोषीय बांड जारी करके करता है। जापान और चीन दोनों के पास 20 खरब अमरीकी शेयर हैं। अमरीका वैश्विक अर्थव्यवस्था का डिफाल्टर बनने के करीब है। उसका वित्तीय घाटा बढ़ रहा है। वहां कर्ज और जीडीपी का अनुपात 100 फीसदी से ज्यादा हो गया है। अमरीकी अर्थव्यवस्था का कुल कर्ज 54 लाख करोड़ डालर की अकल्पनीय सीमा के पार चला गया है। 4,71,38,283 से अधिक लोग खाद्य स्टाम्प पाते हैं, क्योंकि वे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी नहीं कर सकते। रोजाना कुर्की और दिवालिया होने के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। केवल 2011 में ही 22 नवंबर तक वहां कुर्की के 10,30,952 और दिवालियापन के 15,96,544 मामले दर्ज किए गए हैं।

डॉलर के लिए भारतीय रूपये की कुर्बानी
विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को यह सिद्धांत देकर बीहड़ में धकेल दिया जाता है कि सस्ती मुद्रा निर्यात को प्रोत्साहित करती है और केवल निर्यात केंद्रित विकास ही किसी देश को औद्योगिकृत और विकसित बना सकता है। डालर की तुलना में अपनी मुद्राओं को मजबूत होने से बचाने के लिए विदेशी मुद्रा विनिमय यानी फारेक्स बाजार में केंद्रीय बैंकों का डालर की खरीदारी के रूप में सीधा हस्तक्षेप होता है। डालर के इन भंडारों का पुनप्रयोग अमरीका में राजकोषीय बांड यानी टी-बांड खरीदने में किया जाता है। डालर भंडार के जमाव से घरेलू अर्थव्यवस्था में अत्यधिक धन आ जाता है, जिसका विभिन्न बाजार स्थिरीकरण बांडों के जरिए सही इंतजाम न किया जाए तो उच्च महंगाई दर की नौबत आ जाती है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने 2008 में 40 अरब डालर खरीदे, ताकि रुपए को मजबूत होने से रोका जाए। आरबीआई की प्रत्येक डालर की खरीद के लिए व्यवस्था में समतुल्य परिमाण में रुपए डाले गए, जिससे महंगाई की समस्या उत्पन्न हुई जो गरीबों को सबसे ज्यादा सता रही है। इस तरीके से अमरीका ने अपनी मुद्रास्फीति को भारत और उसके जैसे अन्य देशों में भेज दिया। जब चैतरफा दबाव में वृद्धि होती है, तो अधिशेष तरलता को सोखने के लिए आरबीआई बाजार स्थिरीकरण बांड जारी करता है। ये बांड भारत के सालाना उधारी कार्यक्रम से बाहर हैं और इससे देश के बढ़ रहे राजकोषीय घाटे को पाटने में मदद मिलती है। भारत सरकार ने 2007 में वित्त वर्ष 2007-08 के लिए इसकी सीमा को तीन बार बढ़ा कर 2.5 लाख करोड़ रुपए यानी 63.6 अरब डालर कर दिया। इस पूरी प्रक्रिया में आरबीआई को ब्याज अंतर के चलते 3 फीसदी का नुकसान झेलना पड़ा। इस रास्ते में भारत सरकार ने डालर के आगमन पर 3 फीसदी की सब्सिडी दी, जिसे निम्न उत्पादकता वाली अमरीकी प्रतिभूतियों में निवेश किया गया। इससे पूंजी के बहिर्गमन की अमरीकी समस्या सुलझाने में मदद मिली।

अमरीका अपने घाटे को कम ब्याज दरों पर वित्त-पोषित करता है और कांग्रेस से कर्ज की सीमा बढ़ाकर अपने कर्ज को और बढ़ा रहा है। इस साल इसे बढ़ाकर 14,970 अरब डालर कर दिया गया। अमरीका को इस तरह दिवालिया होने का खतरा नहीं है, क्योंकि उसकी मुद्रा डालर दुनिया की रिजर्व मुद्रा है और निक्सन द्वारा 1971 में सोने-डालर की परिवर्तनीयता खत्म कर देने के बाद इसे बिना किसी ‘सोना’ या ‘पदार्थ’ के बैकअप के मर्जी के अनुसार छापा जा सकता है।

आज दुनिया में अमरीका सबसे बड़ा कर्जदार देश है, लेकिन मजे की बात यह है कि इसका विदेशी कर्ज उसी की मुद्रा में है, जिसे वह जब चाहे जितना चाहे छाप सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो चंद कागज के टुकड़ों के बदले वह दुनिया के किसी कोने से कुछ भी मंगा सकता है। बेहतरीन सामान और मानवीय प्रतिभाएं इसी डालर की लालच में अमरीका की ओर खिंचे चले आते हैं। इसलिए अमरीका अपनी मौद्रिक नीति के प्रति बहुत सचेत रहता है। इसी के बल पर वह ब्याज दर को निम्न, महंगाई दर को निम्न और डालर को मजबूत रखता है ताकि उसकी टी-प्रतिभूतियों और बांडों को वैश्विक स्तर पर आत्मविश्वास से बेचा जा सके। अमरीका अपनी मुद्रास्फीति को कमजोर देशों में भेज देता है। अमरीका तमाम मुश्किल हालातों के बावजूद मजबूत डालर की नीति बनाए रखना चाहता है, क्योंकि उसका विश्व प्रभुत्व डालर-तेल गठजोड़ पर कायम है। अब अमरीकी अर्थव्यवस्था गहरी होती मुसीबत में फंसी है और बजट घाटा हजारों अरब डालर में है। डालर को इस तरह निकाला जा रहा है कि वह तेल बाजार के जरिए दोबारा इस्तेमाल हो जा रहा है। मांग में कमी के बावजूद तेल की कीमतों में वृद्धि इसलिए हुई है, क्योंकि तेल बिल डालर में ही होता है और विकासशील देश तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अधिशेष डालर बचा लेते हैं। चूंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी मंद है, इसलिए अमरीका पश्चिम एशिया में संकट पैदा करने में जुटा है, ताकि तेल की कीमतें उच्च बनी रहें। लीबिया के बाद अब पाकिस्तान और ईरान संकट पैदा करने के लक्ष्य हैं। डालर की कृत्रिम मांग डालर को मजबूत बनाए रखती है। अधिशेष डालर पुनः अमरीकी बांड बाजार में निम्न ब्याज दरों पर उपयोग में आ जाता है। इसलिए अमरीका अपने साम्राज्य को कायम रखने के लिए मौद्रिक हेरफेर की जटिल नीति का अनुसरण करता है। जब भी सोने में डालर की तुलना में मजबूती आती है, अमरीका डालर की मांग बढ़ाने के लिए एक या कई संकट उत्पन्न कर देता है। सोने के कमजोर होने से सोना कभी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए वैकल्पिक सुरक्षित निवेश नहीं बन सकता। इस अस्वाभाविक घटना के विरुद्ध बाजारु शक्तियों के एकजुट होने के बावजूद डालर-सोना-तेल नीतियों में हेरफेर कर अमरीका डालर को मजबूत बनाए हुए है।

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