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नेहरू ने ऐसा क्यूँ कहा “I AM HINDU BY AN ACCIDENT”

नेहरू खानदान यानी गयासुद्दीन गाजी का वंश 

  • भारत मे और कोई नेहरू क्यूँ नहीं हुआ ?

  • नेहरू ने ऐसा क्यूँ कहा “I AM HINDU BY AN ACCIDENT”

  • कभी फ़िरोज़ H/o इंदिरा गाँधी उर्फ़ मेमुना बेगम का जन्म या मृत्यु दिवस मनाते नहीं देखा है, क्यों?

1. गंगाधर नेहरु

इस देश मे पैसठ सालो से कांग्रेस  का राज रहा .. फिर भी ये नेहरु का कश्मीर का घर क्यों नही खोज पाए ? खोज तो लिए फिर उसे जाहिर क्यों नही किया ? असल मे ये  खानदान मुस्लिम मूल का है
नेहरू से पहले ….नेहरू कीपीढ़ी इस प्रकार है….

1. गंगाधर नेहरु
2. राज कुमार नेहरु
3. विद्याधर नेहरु
4. मोतीलाल नेहरु
5. जवाहर लाल नेहरु
गंगाधर नेहरु (Nehru) उर्फ़ GAYAS -UD – DIN SHAH जिसे GAZI की उपाधि दी गई थी ….
GAZI जिसका मतलब होता है (KAFIR – KILLER) इस गयासुद्दीन गाजी ने ही मुसलमानों को खबर (मुखबिरी ) दी थी की गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड में आये हुए हैं , इसकी मुखबिरी और पक्की खबर के कारण ही सिखों के दशम गुरु गोबिंद सिंह जी के ऊपर हमला बोला गया, जिसमे उन्हें चोट पहुंची और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई थी.और आज नांदेड में सिक्खों का बहुत बड़ा तीर्थ-स्थान बना हुआ है.|

जब गयासुद्दीन को हिन्दू और सिक्ख मिलकरचारों और ढूँढने लगे तो उसने अपना नामबदल लिया और गंगाधर राव बन गया, और उसे इससे पहले मुसलमानों ने पुरस्कार के रूप में अलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में इशरत मंजिल नामक महल/हवेली दिया, जिसका नाम आज आनंद भवन है.| आनंद भवन को आज अलाहाबाद में कांग्रेस उर्फ पोर्नग्रेस का मुख्यालय बनाया हुआ है इशरत मंजिल के बगल से एक नहर गुजरा करती थी, जिसके कारण लोग गंगाधर को नहर के पास वाला, नहर किनारे वाला, नहर वाला, neharua,आदि बोलते थे जो बाद में गंगाधर नेहरु अपना लिखने लगा इस प्रकार से एक नया उपनाम अस्तित्व में आया नेहरु और आज समय ऐसा है की एक दिन अरुण नेहरु को छोड़कर कोई नेहरु नहीं बचा …
अपने आप को कश्मीरी पंडितकह कर रह रहा था गंगाधर क्यूंकि अफगानी था और लोग आसानी से विश्वास कर लेतेथे क्यूंकि कश्मीरी पंडितभी ऐसे ही लगते थे.
अपने आप को पंडित साबित करने के लिए सबने नाम के आगे पंडित लगाना शुरू कर दिया
1. गंगाधर नेहरु
2. राज कुमार नेहरु
3. विद्याधर नेहरु
4. मोतीलाल नेहरु
5. जवाहर लाल नेहरु लिखा ..और यही नाम व्यवहार में लाते गए …

  • पंडित जवाहर लाल नेहरु अगर कश्मीर का था तो आज कहाँ गया कश्मीर में वो घर आज तो वो कश्मीरमें कांग्रेस का मुख्यालय होना चाहिए जिस प्रकार आनंदभवन कांग्रेस का मुख्यालय बना हुआ है इलाहाबाद में….

  • आज तो वो घर हर कांग्रेसी के लिए तीर्थ स्थान घोषित हो जाना चाहिए

  • ये कहानी इतनी पुरानी भी नहीं है की इसके तथ्य कश्मीर में मिल न सकें ….आज हर पुरानी चीज़ मिल रही है ….चित्रकूट में भगवन श्री राम के पैरों के निशान मिले,लंका में रावन की लंका मिली, उसके हवाई अड्डे, अशोक वाटिका, संजीवनी बूटी वाले पहाड़ आदि बहुतकुछ….समुद्र में भगवान श्री कृष्ण भगवान् द्वारा बसाईगई द्वारिका नगरी मिली ,करोड़ों वर्ष पूर्व की DINOSAUR के अवशेष मिले तो 150 वर्ष पुरानाकश्मीर में नकली नेहरू काअस्तित्व ढूंढना क्या कठिन है ?????दुश्मन बहुत होशिआर है हमें आजादी के धोखे में रखा हुआ है,

  • इस से उभरने के लिए इनको इन सब से भी बड़ी चुस्की पिलानी पड़ेगी जो की मेरेविचार से धर्मान्धता ही हो सकती है जैसे गणेश को दूध पिलाया था अन्यथा किसी डिक्टटर को आना पड़ेगा या सिविल वार अनिवार्य हो जायेगा

तो क्या सोचा हम नेहरू को कौनसे नाम से पुकारे ? जवाहरुद्दीन या चाचा नेहरू ?
जो नेहरू नेहरू कहते है उनसे पूछिये की इस खानदानके अलावा भारत मे और कोई नेहरू क्यूँ नहीं हुआ ?अगर यह वास्तव मे ब्राह्मण था तो ब्राह्मनों मे नेहरू नाम की गोत्र अवश्य होनी चाहिए थी ? क्यूँ नहीं ?क्यों देश मे और कोई नेहरू नहीं मिलता?क्या ये जवाहर लाल के परिवार वाले आसमान से टपके थे ?

  • जो लोग नेहरू गांधी परिवार को मुस्लिम मानने से इंकार करते है उनके लिए प्रश्न

  • # देश मे सोलंकी, अग्रवाल, माथुर, सिंह, कुशवाहा, शर्मा, चौहान, शिंदे, कुलकर्णी, व्यास, ठाकरे आदि उपनाम हजारो, लाखो करोड़ो कीसंख्या मेमिलेंगे लेकिन “नेहरू” सेकड़ों भी नहीं है क्यूँ?

  • # कश्मीरी हमेशा अपने नाम के पीछे पंडित लगाते है लेकिन जवाहर लाल के नाम के आगे पंडित कैसे ? गंगाधर के पहले का इतिहास क्यूँ नहीं है ?

  • # नेहरू ने ऐसा क्यूँ कहा “I AM HINDU BY AN ACCIDENT”

क्या ये प्रश्न आपके मन मे उठे कभी ? ?? ? इस कोंग्रेसी वामपंथी इस कोंग्रेसी महिमामंडित गांधी नेहरू इतिहास ने कभी मौका ही नहीं दिया ? ? ?ऐसे ही मासूम विद्यार्थियों के भेजे मे यह गांधी नेहरू परिवार

की गंदगी भरी जा रही है देश के लाखो स्कूलो मे…इस गांधी नेहरू नाम के इतिहास के सामने राम कृष्ण, राणा, शिवाजी आदि हजारो महावीरों सपूतो के किस्से इतिहास भी नगण्य किए जाते है…इतिहासकारो और इतिहासिक संस्थानो पर कॉंग्रेस और वामपंथियों का कब्जा है कैसे देश की पीढ़ी वीर बनेगी ? ? ? ?

इस परिवार ने देश के अन्य वीर शहीदो की शहीदी को भू फीका कर दिया अपने महिमामंडित इतिहास से हर पन्ने पर इनका नाम नजर आता है …हमें तो अब चाहिए पूर्ण आजादी …राम कृष्ण राणा शिवाजी के देश मे नकली गाँधी नेहरू नाम के पिशाच नहीं चाहिए
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Feroze Gandhi

* जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गाँधी ने तो अपने बेटा-बेटी के आपस में रिश्ते नहीं किए तब कहाँ से आ धमका नेहरू-गाँधी खानदान और उनके जॉइंट वारिस? जिनका गाँधी जी से कोई वास्ता नहीं है, वे गाँधी के वंशज कैसे बन गये?

* जवाहरलाल नेहरू राहुल-वरुण की दादी के पिता जी थे, यानि तीसरी पीढ़ी में. तब ये नेहरू के वंशज कैसे बन गये?

* क्या नेहरू ने दूर की सोचकर अपने दामाद फ़िरोज़ को गाँधी नाम दिलाकर विधि-विधान के विरुद्ध कार्य किया था?

* पैदा होने के बाद आदमी का धर्म तो बदला जा सकता है, लेकिन जाति बदले का अधिकार तो विधि के हाथ भी नहीं है.

* फ़िरोज़ जहाँगीर घंडी को किन्ही दस्तावेज़ो में पारसी (ज़्रोस्ट्रियन) लिखा गया है. बरहाल वे पारसी थे कि, मुस्लिम इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन गाँधी जी के कुछ नहीं थे और न ही वे किसी भी तरह से गाँधी थे. कश्मीरी कौल ब्राहमण की बेटी इंदिरा और फ़िरोज़ की संतान गुजरात के गाँधी बनिये किस विधि से हो सकती है?

* इस देश के पढ़े लिखे लोग ग़लत बात का विरोध क्यों नहीं करते? इस नामकरण से इस देश का बहुत कुछ बर्बाद हो रहा है, और बर्बाद हो चुका है….?

* अगर यह छद्म नामकरण रोक दिया जाता तो आज देश की तस्वीर ही कुछ और होती. चुनाव में नेहरू-गाँधी के वंशज की झोक में ठप्पा मारने वालों का रुख़ ही कुछ और होता और 5-7% वोट का डेवियेशन इस देश की तकदीर बदल देता.

* पढ़े कथित गाँधी-नेहरू के वंशज की असलियत, जिससे लम्बे समय से इस देश का वोटर्स धोखा में हैं:

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एक और तर्क दिया जाता है इस बात के लिए की ,
क्या वजह थी कि जब इंदिरा ने फिरोज़ जहांगीर शाह; पारसी मुसलिमद्ध से ब्याह रचाया तो नहेरु ने उनकी एक नहीं सुनी और गांधीजी ने  फिरोज को गोद लेना पडा़। मेरी समझ में तो पूरे देश की तरह शायद गांधी जी भी यही मानते थे कि आज़ादी की लड़ाई में सबसे ज्यादा योगदान उन्हीं का है और इसलिए वो नहीं चाहते थे कि गांधी नाम की विरासत उनके साथ ही खत्म को जाए, वो चाहते थे कि उनका नाम सियासी गलियारों में हमेशा गूंजता रहे, लेकिन खुद को किसी पद से जोड़ के महानता का चोगा त्यागे बिना। उन्हें ये मौका इंदिरा की शादी से मिला,गांधी जी का एक और गुण भी था उनकी दूरर्दर्शिता, इंदिरा में नेतृत्व के गुण वो पहले ही देख चुके थे,वो जानते थे कि इंदिरा से परमपरागत राजनीती की शुरुआत होगी और इसीलिए उन्होंने फिरोज़ को गोद लिया और उसे अपना नाम दिया।

लोगों का मानना है कि र्सिफ हिन्दु कट्टरपंथी ही नहीं नेहरु जी भी इस शादी के खिलाफ थे,पर नेहरु ने अपनी एक किताब में लिखा है कि फिरोज़ को वो बेहद पसंद करते थे और उन्हें इस शादी से नहीं बल्कि लोंगों के विद्रोह से परेशानी थी,जिसका अंदाजा उन्हें और गांधी जी को पहले से था। देश आज़ादी की कगार पे था और गांधी जी का प्रभाव अपने चरम पे,उन्होंने इंदिरा और फिरोज के पक्ष में एक वक्तव्य जारी किया,जिसे पढ़ के और सुन के सभी शांत हो गये। फिर भी उन्होने फिरोज को अपना नाम दिया, चाहे इंदिरा हो,राजीव हो,सोनिया या अब राहुल,ये तो बस अलग-अलग चेहरें हैं, देश चलाने वाला तो गांधी ही है,पर हम तो उन्हें महात्मा के नाम से जानते हैं!          

“समंदरे शोहरत का साहिल नहीं होता,
 डूबते हैं बड़े बड़े तैराक इस समंदर में!!!  ”  

  • इस देश की कुछ जनता को पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा-फिरोज का जन्म और मृत्यु दिवस मनाते देखा है. राजीव और संजय का भी मृत्यु दिवस कुछ पोलिटिकल/ सरकारी/ जनता द्वारा मनाया जाता है. मज़े की बात देखिए कि कभी फ़िरोज़ H/o इंदिरा गाँधी उर्फ़ मेमुना बेगम का जन्म या मृत्यु दिवस मनाते नहीं देखा है, क्यों?
  • इंदिरा के पति यानी कि राजीव व संजय के पिता का नाम लेवा कोई क्यों नहीं रहा, यानी कि जो हैं वे उनके ये पावन दिन क्यों नहीं मनाते हैं? क्यों नहीं उनकी कब्र पर उनके वंशज अमुक दिन माला या फूल चढ़ाने जाते हैं? क्या फ़िरोज़ का इंदिरा से शादी करके दो बच्चे पैदा करने का ही कांट्रॅक्ट था? ये सब ज्वलंत प्रश्न हैं.
Feroze Gandhi
फिरोज गांधी
Member of the Indian Parliament
for Pratapgarh District (west) cum Rae Bareli District (east)[1]
In office
17 April 1952 – 4 April 1957
Member of the Indian Parliament
for Rae Bareli[2]
In office
5 May 1957 – 8 September 1960
Succeeded by Baij Nath Kureel
Personal details
Born 12 September 1912
Bombay, Bombay Presidency, British India
Died 8 September 1960 (aged 47)
New Delhi, Delhi, India
Resting place Parsi cemetery, Allahabad
Nationality Indian
Political party Indian National Congress
Spouse(s) Indira Gandhi
Children Sanjay Gandhi,
Rajiv Gandhi
Religion Zoroastrianism [विकिपेडीया से उपलब्ध]
  •  अब भी अगर इस लेख पर विश्वास ना आ रहा हो तो इस लिंक को विजिट करे [http://www.vepachedu.org/Nehrudynasty.html]
  • दस्तावेज़ों और नेट पर उपलब्ध विवरण के अनुसार फ़िरोज़ एक मुस्लिम पिता और घंडी गोत्र की पारसी महिला की संतान थे. देवी इंदिरा और फ़िरोज़ ने प्रेम विवाह किया था. नेहरू अपना वंश चलाने के लिए अपने दो नातियों राजीव और संजय में से एक को गोद ले सकते थे, लेकिन उस दशा में वह शख्स नेहरू कहलाता. अगर नेहरू ने फ़िरोज़ को घर जमाई भी रख लिया होता तो भी उसके बच्चे नेहरू हो गये होते. यानी कि नेहरू ने अपनी इकलौती बेटी इंदिरा का विवाह कर दिया था, लेकिन तत्पश्चात किसी को गोद नहीं लिया था. इस प्रकार जादायद भले ही इंदिरा को मिले लेकिन खानदानी वारिस होने का हक उसे नहीं मिल सकता है. इस प्रकार जवाहरलाल नेहरू का खानदान उनकी मृत्यु के साथ ही ख़त्म हो गया था. इंदिरा-फ़िरोज़ की संतान फ़िरोज़ की वंशज हुई न कि नेहरु की.
  • फ़िरोज़ ख़ान क्यों और कैसे गाँधी बन गये, यह एक रोचक बात है. अगर किसी की माँ उसके बाप को तलाक़ देकर खुद बच्चे की परवरिश करे और उसे अपने परिवार का नाम दे तो भी उस दशा में फ़िरोज़, फ़िरोज़ घंडी हो सकते थे. हम नहीं जानते कि फ़िरोज़ के साथ ऐसा कुछ हुआ था या नहीं?
  • रही समस्त बुराई की जड़ मोहन दस करमचंद गाँधी द्वारा फ़िरोज़ को गोद लेने की बात. यह भी सुना है कि सेकुलर नेहरू फ़िरोज़ से इंदिरा का विवाह करने को तैयार नहीं थे, जबकि वह पहले ही बिना बाप को बताये शादी कर चुकी थी. ऐसी दशा में गाँधी ने कहा था कि वे फ़िरोज़ को गोद लेते हैं. गोद लेना कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं है. गोद लेने की एक प्रक्रिया है, एक एक विधि-विधान है. एक उम्र है. यही नहीं गोद लेने के लिए जाति आधारित क़ानून भी थे. गाँधी जी कोई खुदा नहीं थे कि वे जब जो चाहे कर लेते. तब गाँधी ने अगर यह बात की भी तो यह बड़ी ही हास्यस्पद घटना है, और एक बेरिस्टर से ऐसी मूर्खता पूर्ण बात की कल्पना नहीं की जा सकती है. (इससे साबित होता है की वो बेरिस्टर की डिग्री के नाम पर विदेश किसी और मिशन पर गए थे)
  • दादी के पिता जी का वारिस दादी का पोता हो, शायद यह अजूबा दुनिया में भारत में ही मान्य हो सकता है. अधिकतर लोगों को तो अपनी दादी के पिता जी का भी नाम मालूम न होगा. दादी के पिता जी का वारिस दादी हो सकती है या दादी का पुत्र, भला पोता काहे और कैसे वारिस हो जाएगा? और वह भी बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के.
  • इनके नेहरु के वारिस होने की ही नहीं कुछ सिरफिरे लोग इनके गाँधी के वारिस होने की भी बात करते हैं. वह यह नहीं बताते कि ये लोग कौन से गाँधी के वारिस हैं? इन्हें उस गाँधी का पूरा नाम लेना चाहिए. यह देश तो गाँधी का मतलब मोहनदास कर्मचंद गाँधी मानता है. अगर फ़िरोज़ उर्फ छद्म गाँधी की बात कर रहे हैं तो उसका पूरा नाम क्यों नहीं लेते, कभी उसका जन्म या मृत्यु दिवस क्यों नहीं मनाते? कभी उसकी कब्र पर झाड़पूंछकर फूल पत्ते क्यों नहीं धरते? और अगर महात्मा गाँधी जी के वारिस होने की बात करते हैं तो गाँधी जी का अपना भरा पूरा परिवार है, वे दूसरों को वारिस क्यों बनाते? यह तो ऐसा हुआ जैसे कि खरगोश ऊँट का वारिस होने की ताल ठोक रिया हो.
  • तब प्रश्न उठता है कि फ़िरोज़, फ़िरोज़ गाँधी कैसे हो गये, और उन्हें इस उपनाम जो की गुजरात के बनिए वर्ग में प्रयुक्त होने वाले गाँधी के उपयोग की इजाज़त किसने और क्यों दी? फ़िरोज़ को अपने सही नाम पर क्यों आपत्ति हुई, और क्यों ही उसे नाम बदलने की ज़रूरत पड़ी? देश के बहुत से लोग तो आज भी यह समझते हैं कि यह कथित गाँधी परिवार महात्मा गाँधी से रिलेटेड है, जबकि ऐसा कतई नहीं है. कथित कश्मीरी पंडित की बेटी इंदिरा-फ़िरोज़ से विवाह करके गाँधी बनिया कैसे पैदा कर सकती थी? इस देश के पढ़े लिखे तबके को यह सोचना चाहिए.
  • राहुल के दादा फ़िरोज़ थे, और दादी कथित कश्मीरी पंडित की बेटी थी, और वह भी तीन पीढ़ी पहले. राहुल एक इटलियन लेडी और राजीव वल्द फ़िरोज़ की औलाद है, तब वह नेहरू-गाँधी परिवार का वारिश किस विधि से हो गया, इस देश के प्रबुद्ध जन इस पर विचार करे. यही नहीं कथित रूप से भी राहुल ही नेहरू-गाँधी परिवार का वारिस क्यों हुआ, मेनका-संजय का बेटा वरुण भी वारिस क्यों नहीं हुआ?
  • क्या इस नामकरण की साजिश में गाँधी और नेहरू भी शामिल थे? और अगर ऐसा था तो गाँधी ने इस देश के साथ बहुत बड़ा जघन्य धोखा अपराध किया है. धर्म परिवर्तन हो सकता है लेकिन दुनिया की कोई विधि-विधान जाति परिवर्तन नहीं कर सकता है, यानी कि गाँधी जी फ़िरोज़ को गुजराती बनिया गाँधी में परिवर्तित नहीं कर सकते थे, किसी प्रौढ़ फ़िरोज़ को गोद नहीं ले सकते थे. अपना भरा पूरा परिवार होते हुए भी अपना नाम किसी प्रौढ़ को दे देने का अधिकार गाँधी जी को भी प्रदत्त नहीं था.
[Allahabad Parsi Anjuman trustee Rustom Gandhi has sent an e-mail to Parsiana detailing how his efforts with government departments for improvements to the neglected Allahabad Parsee Cemetery have borne fruit. Feroze Gandhi, husband of the late Prime Minister Indira Gandhi is buried here.]
  • दस्तावेज़ों के अनुसार फ़िरोज़ की कब्र इलाहाबाद के पारसी  कब्रिस्तान में हैं. दूसरों की कब्र/ समाधियों पर माला टांगने वाले लोग क्यों नहीं अपने पूर्वज फ़िरोज़ की कब्र की सुध लेते हैं? शायद इसलिए कि कहीं लोग असलियत न जान जाएँ.
  • जो लोग शासन की समझ रखते हैं वें भी जानते होंगे कि सेना प्रत्यक्ष रूप से ही युद्ध में हार जीत के निर्णय में भागीदार होती है असली जीत का भागीदार तो कोई और ही होता है. एक चार कमरे के मकान में कोई अंजान व्यक्ति फ्रीली नहीं घूम सकता. तब अरब़ अक्रांता/ अँग्रेज़ों ने कैसे इस इतने बड़े मुल्क पर फ़तह कर उसे सैकड़ों वर्ष तक गुलाम बनाए रखा? रावण जैसा विद्याधर, योद्धा क्या यूँ ही राम के हाथों हार गया, और मारा गया. जी नहीं सच यह है कि `घर का भेदी लंका ढ़ावे’ हुआ है. जीत के लिए श्रेय हमेशा सशक्त ख़ुफ़िया तंत्र के सिर होता है. हार के प्रमुख कारणों में से एक कारण, पराजित देश के देशद्रोही/ समाजद्रोही भेदियों की नकारात्मक भूमिका होती है. अगर ये देशद्रोही/ समाजद्रोही भेदिये विजयी सेना के ख़ुफ़िया तंत्र को अपने देश के राज न दें तो स्थिति ही कुछ और होती 
  • आज इस देश में सोनिया क्या अपने बल पर अध्यक्ष बनी बैठी है? क्या उसमें इतना बूता है? तो उत्तर होगा कतई नहीं. यहाँ दो पहलू हैं एक तो यह प्रोपगॅंडा की राहुल नेहरू-गाँधी खानदान का वारिस, जैसे कि वरुण उनमें से किसी का कुछ न लगता हो. दूसरे वे कौंच के बीज इस कुकर्म में दोषी हैं जो इस देश की बर्बादी में विभीषण की भूमिका निभा रहे हैं, और सत्ता और संपत्ति के लालच में डूबे हैं. 
  • उन विभीषणों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी विभीषण का नाम समाज में गाली समझा जाता हैं. वे अपने मन से अपने कुकर्मों का हिसाब लगाकर कभी ज़रूर देखे, और की तो छोड़िए उनकी आत्म ही अगर कभी जाग गयी तो उन्हें माफ़ न करेगी. किसी की आत्मा कभी जागे न जागे लेकिन मृत्यु के समय ज़रूर जागेगी, ….और उस समय उन्हें देश के समाज के साथ धोखा करने के पाप का बोध तो हो जाएगा, लेकिन तब प्रायशचित का न तो समय रहेगा, न ही शक्ति.

जननी जनमभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

सुखस्य मूलं धर्म:
धर्मस्य मूलं अर्थ:
अर्थस्य मूलं वाणिज्य:
वानिजस्य मूलं स्वराज्य:
स्वराज्यस्य मूलं चारित्रं.

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गांधी-कॉंग्रेस का काला इतिहास – भाग 1 / 6

 गांधी-कॉंग्रेस का काला इतिहास – भाग 1 / 6

संशोधन एवं संकलन – जुगल पटेल
100 – राज हंस सोसा। अंदाडा 
अंकलेश्वर – जी – भरूच –
गुजरात -393 010
आज की युवा पीढ़ी  को सच जाने का हक है ! कॉंग्रेस के छपवाए जूठे स्कूली इतिहास पर मूजे आपत्ति है! तो जानिए हकीकत का विस्फोटक इतिहास जिसमे सत्यΦ विश्वास और पारदर्शिता के साथ प्रस्तुति की गई है !   
इसके तथ्य, सत्य होने पर शंका या कोई भी आपत्ति होने पर सम्पर्क करे eguru24x7@gmail.com आपको ब्रिटिश लाइब्रेरी के आर्काईवास की लिंक भेज दी जाएगी 

बीसवीं सदी में भारतीय इतिहास

वीर सावरकर ने बरसों पूर्व भारतीयों को उनके गौरवशाली इतिहास और परम्परा से परिचित करवाने के लिए भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ नामक ग्रन्थ की रचाना की थी ताकि भारतीय अपने आप को पहचाने और किसी भी प्रकार की विदेशी सत्ता के समक्ष नत-मस्तक ना हो, राष्ट्रीय जीवन मूल्यों की आभा से उनका जीवन ही नहीं वरन मुख मण्डल भी प्रदीप्त रहे किंतु वर्तमान में विचारधारा के संघर्षकाल में या यू कहे कि संक्रमण काल में देश घटनाक्रम जिस तेजी से करवट ले रहा उससे आम नागरिक भौचक्का सा रह गया है, वैचारिक भ्रम इतना गहरा रहा है कि सच और झूठ में विभेद कर पाना काफी कठिन लगता है, ऐसे में देशवासियों को उनके स्वत्व, गौरव गरिमा और इतिहास के बारें में अवगत कराने की दृष्टि से लिखी गई है यह लेखमाला। इस लेख में 15 अगस्त 1947 से लेकर आज तक हमारे भाग्य विधाताओं ने जो महत्वपूर्ण भूले की है उनका वर्तमान में हमको क्या मूल्य चुकाना पड़ रहा है, के बारें में चर्चा की गई है।)

बीसवीं सदी में भारतीय इतिहास के छः काले पन्ने भाग .1

 इस वर्ष आपातकाल को कई साल बीत गए है। यह एक ऐसी घटना थी, एक ऐसा कानून था, जिसे लागू करने वाले लोग भूल जाना चाहते है और भुगतने वाले रह-रहकर याद रखना अपना धर्म समझते है। सवाल यह है कि हम भारत के लोग इतिहास से सबक लेकर कब अपना वर्तमान बुनेगें और भविष्य संवारेगें? हम भारतीयों के सम्बंध में यह सामान्य धारणा है कि हमारी सामाजिक स्मृति कमजोर है। हमारा कोई बुरा करे, हम पर आपराधिक कृत्य करें, आक्रमण करे या हमारे देश में बम विस्फोट करे, तो हम उसे भूलकर अपने आपको महान् और दयावान बताने का प्रयास करते है। भारतीय अपने पर आक्रमण करने वाले को भूल जाते है। उन्हे वे चेहरे याद नहीं रहते, जिन्होने उन्हे दास बनाया। हम भारतीय उन कारणों की कभी समीक्षा नहीं करते जो हमारी अवनति और पराजय के लिए जिम्मेदार होते रहे है। हमें न तो उपकार याद रहता है और न अपकार। 
इसलिए हम अपने लिए काम करने वाले, अपने लिए शहीद हो जाने वालों या हमारे लिए तिल-तिल कर जीवन गला देने वालों को भी भूल जाते है। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह आज पाठ्यक्रम से बाहर है। गांधी के स्वदेशी और स्वाबलंबन कार्यक्रमों से देशवासी कोसो नहीं हजारों मील दूर चले गए है। देश की सुरक्षा में शहीद हुए नायको से नाता 15 अगस्त और 26 जनवरी को बजने वाले गानों की कैसेट में सिमटकर रह गया है। वस्तुत: भूल जाने की वृत्ति के कारण भारतीय समाज ने समय- समय पर बड़ी कीमत चुकाई है। ऐसी कीमत जो दुनिया के किसी देश और कौम ने नहीं चुकाई। हमें यह सीखना होगा कि कोई हमारे साथ गलत करे तब हम उसे सजा अवश्य दे। हमलावर पुनरावृत्ति न करे, इस बात के लिए हमने आवश्यक कदम न उठाए तो यह मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं। आपातकाल गत शताब्दी के प्रमुख काले पन्नों में से एक है। बीती शताब्दी में समय ने कई काले पन्ने लिखे है उनमें से प्रमुख छः काले पन्ने देशवासियों के विचारार्थ प्रस्तुत है-

 प्रथम काला पन्ना – सुभाष बाबू की राजनैतिक हत्याकिसी भी देश, व्यवस्था अथवा व्यक्ति के जीवन में जो बाते प्रथम बार होती है, उनका प्रभाव उस पर सदियों तक बना रहता है। जब भारत आजाद हुआ तो उसका पहला शासक कौन बना? उसकी नीतियां क्या थी? इसका प्रभाव उस देश, वहां की जनता व आगे आने वाली कई पीढिय़ों पर पड़ता है। किसी संस्था का स्थापना पुरूष कौन है? इस बात का असर जीवन भर उस संस्था पर बना रहता है। प्रारंभ का यह प्रभाव घट-बढ़ सकता है,किंतु समाप्त कभी नहीं होता। सदियों की गुलामी के बाद भारत स्वतंत्र होने पर उसका जो पन्ना लिखा गया, उसके नेपथ्य में जाना आवश्यक है।
एक नायक 48 साल की उम्र में संसार से चला गया! ऐसा कुछ लोग मानते है। 35 साल की उम्र में कोलकाता जैसे महानगर का मेयर बन गया। 41 साल की उम्र में वह युवा जब राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद को ग्रहण करता है तो कांग्रेस ही नहीं, पूरा देश उसकी ओर आशाभरी दृष्टि से देखने लगता है। जनता प्रेम से उसे  नेताजी जैसा सम्मानजनक उपनाम देती है। लोगों को सुभाषचन्द्र बोस के हाथों में स्वतंत्र और समर्थ भारत बनता हुआ दिखाई देने लगता है। लेकिन कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग उनके अध्यक्ष बनते ही उन्हे हटाने के ताने-बाने बुनने लगा। यही से भारतीय इतिहास का यह काला पन्ना लिखा जाना प्रारंभ होता है। कांग्रेस के तात्कालीन कर्ता-धर्ता जैसे-तैसे तो एक साल के लिए उन्हे अध्यक्ष के रूप में धका ले गए लेकिन दूसरे कार्यकाल के लिए जब सुभाष ने फिर अध्यक्ष पद का चुनाव लडऩे की घोषणा की तो कांग्रेस के कर्णधारों में खलबली मच गई। उस वर्ष कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन त्रिपुरी- जबलपुर में हुआ था। सुभाष बाबू बहुत बीमार थे। सहयोगी और सलाहकारों ने उन्हे सम्मेलन में न जाने को कहा, लेकिन वे जिद्द पर अड़े रहे। ठीक समय त्रिपुरी- सम्मेलन में पंहुच गए। कमजोरी और अस्वस्थता के कारण उन्हे स्ट्रेचर पर लिटाकर मंच पर लाया गया। सुसुप्त रूप में गांधीजी के मन में सुभाष बाबू के लिए पूर्व में ही अनमना भाव था। गांधीजी ने जब देखा कि सुभाष बाबू वापस अध्यक्ष बनने जा रहे है तो उन्होने पट्टाभिसीतारमैया को सुभाषचन्द्र बोस के सामने चुनाव में खड़ा कर दिया।

पट्टाभिसीतारमैया को  चुनाव में खड़ा कर दिया

विधिवत चुनाव हुआ जिसमें सुभाष बाबू 200 मतों से विजयी रहे और दूसरे कार्यकाल के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए। चुनाव में अपने उम्मीदवार की पराजय को गांधीजी ने इतनी बड़ी माना कि वे सार्वजनिक रूप से बोले, यह पट्टाभिसीतारमैया की हार नहीं बल्कि मेरी हार है। खुले पण्डाल में सभी राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने विधिवत रूप से चुनाव लड़कर चुने गए उम्मीदवार का अस्तित्व अब खतरे  में था। उनके साथ उनकी कार्यकारिणी के सदस्यों ने असहयोग करना प्रांरभ कर दिया। अपने अध्यक्षीय भाषण में सुभाष ने पांच बिन्दुओं पर प्रकाश डाला। वे बिन्दु आज के संदर्भ में प्रासंगिक भी है व विचार करने योग्य भी। भाषण में रखे गए बिन्दु हमें यह ध्यान दिलाते है कि एक राष्ट्र नायक की दृष्टि व सोच की दिशा कैसी होनी चाहिए वे कहते है –

अध्यक्षीय भाषण में सुभाष

1. कांग्रेस के पास एक अति अनुशासित स्वयंसेवक दल होना चाहिए।
2. स्वतंत्र भारत में शासकीय अफसरों का एक कैडर गठित किया जाये। एडमिनिस्ट्रेशन का वह कैडर कांग्रेस के विचारों से पोषित हो।
3. श्रमिक व किसान संघों को मान्यता देकर कांग्रेस से जोड़ा जाये व उन्हे देश सेवा के कार्यो में लगाया जाये।
4. कांग्रेस में वामपंथियों को चकबंद कर उनसे समझौता किया जाये कि वे भविष्य में समाजवाद पर अडिग रहेगें।
5. भारत के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंध बढ़ाना व भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण करना।

                                     कांग्रेस प्रतिनिधियों से खचाखच भरे पण्डाल के सामने दिए गए उस भाषण में लोगो ने स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की झलक देखी। उन्होने देखा कि 42 साल का यह युवा ओज और तेज से भरपूर है, जिसकी विचार करने की शैली कांच की भांति साफ है। प्रतिनिधियों को उनमें बढ़ते भारत का भविष्य दिखाई दिया लेकिन दुर्भाग्य, उसी अधिवेशन में कांग्रेस कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित किया, उस प्रस्ताव में उन्होने जो लिखा वह निर्वाचित अध्यक्ष पर असंवैधानिक दबाब था। एक अध्यक्ष के नाते कार्य करने की स्वतंत्रता पर सीधा हस्तक्षेप था। कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव में लिखा कि –

  • कार्यसमिति में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को गांधीजी का निर्विवाद विश्वासपात्र होना आवश्यक है।गांधीजी के उम्मीदवार को हराकर अध्यक्ष बने सुभाष बाबू पर यह एक प्रकार से सीधा-सीधा हमला भी था और बंधन भी। जो कुछ भी यहां लिखा जा रहा है वह पट्टाभिसीतारमैया द्वारा लिखित कांग्रेस के इतिहास व कांग्रेस पर लिखित पुस्तकों व उसके सन्दर्भो में वर्णित तथ्यों व प्रमाण के साथ है।
  • Bibliographic information

 

  • कार्यसमिति सीधे-सीधे अध्यक्ष को कह रही थी कि जो भी कार्य करो, फिर चाहे कार्यकर्ताओं का मनोनयन करो अथवा नियुक्ति, वह सब गांधीजी की सहमति के बाद ही करो। उनकी इच्छा पहले जान लो और उसे ही निर्देश मानो। सम्मेलन व उसके बाद कार्य के गतिरोध हटाने पर लम्बी बहस होती रही, बातचीत के कई दौर चले। समकालीन कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने बीच में पड़कर विवाद को बढ़ने से रोकना चाहा। लेकिन दूसरे धड़े को मानने वालों ने सुभाष बाबू को किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता देने से मना कर दिया। संविधान और विधान के तहत चुने गए अध्यक्ष ने थककर कलकत्ता में 1939 में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के खुले मंच से इस्तीफा हाथ में रख, भाषण देते हुए कहा-
1939 में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी

  • मैं अपना ही निवेदन दोहराना चाहता हूं। वे अर्थात गांधीजी त्रिपुरी कांग्रेस द्वारा सौंपे गए दायित्व का वहन करे और कार्यकारिणी समिति मनोनीत करे। हमारा दुर्भाग्य रहा है कि हर प्रकार से विचार-विमर्श के बावजूद महात्मा गांधी कार्यकारिणी समिति नामजद नहीं कर सके। इसलिए सहयोग की भावना से मैं आपको अपना इस्तीफा सौंप रहा हूं।राजनीति के इन काले पन्नों को लिखने की यह शुरूआत थी।                           

 [भाग 1 अंत ! आगे आयेगा भाग 2/6 पढ़ना ना भूले ….जुड़े रहे मेरी ब्लॉग को सबस्क्राइब करे Click On JOIN THIS SITE  Button Above with Google ID !! Share this On FACEBOOK ! Teach Youngster Real HISTORY out of their Fake Textbook History ] 


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वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय एकता के शिल्पी

इतिहास कैसे रचा जाता है इसका इतिहास जानने के लिए भारत में वल्लभ भाई पटेल का प्रयास प्रत्यक्ष प्रमाण है। संकल्प, साहस, सूझ-बूझ के धनी पटेल ने तत्कालीन 565 से भी अधिक देशी रियासतों का भारत मे विलीनीकरण करके राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार के रूप में इतिहास रच दिया है। भारत को सुदृढ़ बनाना उनका सपना था।

जिसे प्रज्ञा और पुरूषार्थ से उन्होंने साकार कर दिया। राष्ट्रीय एकता के शिल्पी के रूप में समय स्वयं उनके कृतित्व के चंवर डुलाता है और इतिहास उनके व्यक्तित्व को पलकों पर बैठाता है। उनकी प्रकृति में पुरूषार्थ, संस्कार में स्वाभिमान, सोच में सार्थकता और संवाद मे स्पष्टवादिता थी। मंदिर पर कलश की तरह उनका कृतित्व और बर्फ की चट्टान में आग की तलवार की तरह व्यक्तित्व था। सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था। उनके पिता झबेर भाई बोरसद ताल्लुका के करमसद गांव के निवासी थे। वे पेशे से साधारण किसान थे। उनकी माता लाड़बाई तथा पिता ने साहस, सच्चाई और सादगी के संस्कार तो सिखाए ही पुरूषार्थ और पराक्रम का पाठ भी पढ़ाया। प्रारंभ में प्रांतीय किसान नेता के रूप में तथा आगे चल कर देश के दिग्गज और दिलेर नेता के रूप में वे अपने फौलादी व्यक्तित्व के कारण लौह पुरूष कहलाए।

15 दिसंबर 1950 को उनका स्वर्गवास हो गया। सरदार पटेल असत्य के आलोचक और सत्य के समर्थक थे। कितना ही शक्तिशाली व्यक्तित्व क्यों न हो अगर वह अहंकारी व अन्यायी होता तो उसे मुंह पर फटकारने का पटेल में गजब का नैतिक साहस था, लेकिन स्वयं से गलती होने पर स्वीकारने की अद्भुत गुण भी उनमें था। उदाहरण के लिए गुजरात क्लब के आमंत्रण पर जब महात्मा गांधी व्याख्यान देने आए तो पटेल ने गांधी जी की उपेक्षा करते हुए कहा मैं इस प्रकार सत्‍यागृहीयों को समर्थन नहीं करता हूं

ये लोग अंजीनिर्वासी करके परम शक्तिशाली ब्रिटिश शासन को यहां से उखाड़ फेंकेगे मुझे इसमें बहुत संदेह है।” लेकिन कालांतर में चंपारण जिले में गांधी जी द्वारा जा रहे सत्‍यागृह को देखकर चमत्कृत और अभिभूत हो गए थे। तब से वे गांधी जी कीआंदोलन पद्धति के प्रशंसक और भक्त बन गए थे। यही कारण था कि उन्होंने सत्याग्रह के महात्मा गांधी के दर्शन को क्रांतिकारी निरूपित किया। उन्होंने खुद सत्याग्रह के कई प्रयोग करके अन्याय व आतंक को ध्वस्त किया। गांधी जी के साथ उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। जिससे उनकी संघर्ष शक्ति और बढ़ गई। नागपुर का झंडा सत्याग्रह, बारडोली का ताल्लुका सत्याग्रह, उनकी ख्याति मे चार चांद लगा गया।
वे टे्रड यूनियन संबंधी सुधारों और आंदोलनों के भी प्रेरणा पुंज थे। जब भारत आजाद हुआ तो जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व मे उन्हें गृह विभाग के साथ-साथ देशी रियासतों का विभाग भी दिया गया। पटेल ने विवेक और- पुरूषार्थो का प्रयोग करके देशी रियासतों का भारत में विलीनीकरण करके भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। यह उनकी दूरदृष्टि और व्यूह रचना का परिणाम था कि जूनागढ़ और हैदराबाद रियासतों का विलय उन्होंने भारत में कराया। हैदराबाद विलय टेढ़ी खीर था, लेकिन पटेल ने अपने अदम्य साहस से वह कर दिखाया।
शेख अब्दुला के प्रभाव में आकर नेहरू जी ने कश्मीर मामले को पटेल के रियासत विभाग से अलग कर दिया। बतौर प्रधानमंत्री नेहरू जी ने कश्मीर को विशेष्ा राज्य के रूप में अपने हाथ में ले लिया था। बाद में कश्मीर के मामले को नेहरू जी संयुक्त राष्ट्र में लेकर गए तब से ही कश्मीर की समस्या सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। पटेल की एक शक्तिशाली सैनिक कार्रवाई कश्मीर समस्या को सदा के लिए सरलता से सुलझा सकती थी। पटेल ने बड़े दुख से कहा था कि “जवाहरलाल और गोपालस्वामी अयंगर ने कश्मीर को व्यक्तिगत विष्ाय बनाकर मेरे गृह विभाग तथा रियासत विभाग से अलग न किया होता तो कश्मीर समस्या उसी प्रकार हल होती जैसे हैदराबाद की।”

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नेहरू का आशिक़ मिज़ाज भारी पड़ा ।

यदि सरदार वल्लभभाई पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने होते तो भारत कश्मीर,आतंकवाद, और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों/ समस्याएं खड़ी ही नहीं होती ।देश का दुर्भाग्य उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन आशिक़ मिज़ाज नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने थे।

राष्ट्रभक्ति की भावनाओं से उनका ह्रदय सराबोर था.दृढ निश्चय और राष्ट्र हित में कुछ भी करने के लिए कृतसंकल्प सरदार पटेल के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग उनके चरित्र का एक पक्ष प्रस्तुत करता है।

सरदार पटेल का सर्व महत्वपूर्ण योगदान था देशी राज्यों का भारतीय संघ में विलय . गृह मंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों(राज्यों) को भारत में मिलाना था। ये दुष्कर कार्य उन्होंने बिना रक्तपात व हिंसा के अपनी बुद्धिमता और कूटनीति के बल पर सम्पादित कर दिखाया।

देश को अखंडता का तोहफा देने वाले सरदार पटेल के साहस ने संभवतः देश के खंड खंड होने से बचाया और उ नके निर्णय देश हित में थे ।राष्ट्र-निर्माता ‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार पटेल को भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हे भारत का लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है।

देश के इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त तेवर के सामने नेहरू का आशिक़ मिज़ाज विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा ।

भारतीय सिविल सेवा के एम ओ मथाई जिन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया. मथाई जी ने एक पुस्तक “Reminiscences of the Nehru Age”(ISBN-13: 9780706906219) ‘लिखी ! किताब से पता चलता है कि वहाँ जवाहर लाल नेहरू और माउंटबेटन एडविना (भारत, लुईस माउंटबेटन को अंतिम वायसराय की पत्नी) के बीच गहन प्रेम प्रसंग था । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और अन्तिम वायसराय लार्ड माउन्टबेटेन की पत्नी एडविना के बीच रोमांस की चर्चा सर्वव्यापी है। एडविना की बेटी पामेला हिल्स ने भी इसे स्वीकार किया।
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भारत की बहुत सी समस्याओं के लिये आशिक़ मिज़ाज जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार माना जाता है। इन समस्याओं में से कुछ हैं:

• लेडी माउंटबेटन के साथ नजदीकी सम्बन्ध
• भारत का विभाजन
• कश्मीर की समस्या
• चीन द्वारा भारत पर हमला
• मुस्लिम तुष्टीकरण
• भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन का समर्थन
• भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देना
• हिन्दी को भारत की राजभाषा बनने में देरी करना व अन्त में अनन्त काल के लिये स्थगन
• भारतीय राजनीति में कुलीनतंत्र को बनाये रखना
• भारतीय इतिहास लेखन में गैर-कांग्रेसी तत्वों की अवहेलना

सन १९६५ के बाद भी भारत पर अंग्रेजी लादे रखने का विधेयक संसद में लाना और उसे पारित कराना : 3 जुलाई, 1962 को बिशनचंद्र सेठ द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू को लिखे गये पत्र का एक हिस्सा निम्नवत है-

राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति सरकार की गलत नीति के कारण देशवासियों में रोष व्याप्त होना स्वाभाविक है। विदेशी साम्राज्यवाद की प्रतीक अंग्रेजी को लादे रखने के लिए नया विधेयक संसद में न लाइये अन्यथा देश की एकता के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।…यदि आपने अंग्रेजी को 1965 के बाद भी चालू रखने के लिए नवीन विधान लाने का प्रयास किया तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

डा. राममनोहर लोहिया ने संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऐशो आराम पर रोजाना होने वाले 25 हजार रुपये के खर्च को प्रमुखता से उठाया था। उनका कहना था कि भारत की जनता जहां साढ़े तीन आना पर जीवन यापन कर रही है उसी देश का प्रधानमंत्री इतना भारी भरकम खर्च कैसे कर सकता है।

एक बार सरदार पटेल ने स्वयं एच.वी. कामत को बताया था कि ”यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीरी मुद्दे को निजी हिफाजत में न रखते तथा इसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह इस मुद्दे को भी देश-हित में सुलझा देता।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज गोपालाचारी ने लिखा-”निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता।

सच में देश को लौहपुरुष की बहुत जरूरत है ,..काश सरदार पटेल प्रधानमन्त्री होते तो देश का हाल कुछ और ही होता ,…..आशिक़ मिज़ाज नेहरू की चाटुकारी नीति आज तक देश को खा रही है ,..कब तक खाती रहेगी ?…पता नहीं

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संविधान के नाम पर महाझूठ !

संविधान के नाम पर भारत के आम आदमी को बरगलाया गया और देखिये सविधान के नाम पर एक षड्यंत्र के तहत देश को कैसे भ्रमित किया जा रहा है … संविधान के नाम पर महाझूठ (

1. जो सविंधान अंग्रेजो ने ( governemnt of indian act 1935) में हमें लूटने के लिए बनाया गया था उसी को संविधान बनाने वालो ने इधर उधर फेरबदल करके पूरी तरह से अपना लिया !

2.. कहा जाता है की इसको बनाने में 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे .लेकिन हकीकत यह है कि संविधान सभा ने सिर्फ 166 दिन ही सविंधान बनाने के लिए काम किया था .इस हिसाब अगर 8 घंटे /दिन काम हो तो सिर्फ 20 दिन में ही सविंधान बन गया था ! दुनिया का सबसे बड़ा सविंधान सिर्फ 20 दिन में बन गया है ना आश्चर्य की बात ?

3.संविधान के अनुसार भारत धर्मनिरपेक्ष है .लेकिन भारत की परम्परा के अनुसार कोई भी देश धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता है बल्कि पंथ और सम्प्रदाय निरपेक्ष हो सकता है .मनु समृति में धर्म के 10 लक्षण दिए गए है .जो उनको अपनाये धार्मिक है भले ही वो किसी भी धर्म या जाती का हो .क्या संविधान निर्माताओ के पास इंतना भी धर्म का ज्ञान नहीं था जितना मेरे जैसे निकम्मे को है

4.कहा जाता है की संविधान बड़े ही दूरदर्शी और देशभक्त लोगो ने बनाया था .लेकिन अगर बनाने वाले इतने ही दूरदर्शी थे क्यों इसमें महज 62 सालो में 97 संशोधन करने पड़ गए है .रही बात देशभक्ति की तो हिंदी के साथ साथ सविंधान को अंग्रेजी में क्यों लिखा गया क्या भारत में और कोई सम्रध भाषा नही थी जिसमे सविधान लिखा जा सकता था .

5. आदरणीय व् पूजनीय बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी ने 1953 में राज्य सभा में जमकर इस संविधान का विरोध किया था .उन्होंने कहा था की हमारे शहीदों की आशाओं पर ये सविधान खरा नहीं उतर पायेगा इसलिए इसे दुबारा बनाना चाहिए !

हमारा महान संविधान देश के 70 % लोगो के लिए रोटी का इंतजाम नहीं कर पा रहा है बाकी की बाते तो दूर की है .ये देश 12 हज़ार साल तक पवित्र गीता द्वारा दिखाए मार्ग पर चला और विश्व गुरु बनने में कामयाब रहा है .देखिये तो सही 12 हज़ार साल पुराने ग्रन्थ में कही कोई ऐसी बात नहीं जिसका संशोधन किया जा सकें ये है भारत की महान परम्परा जिसको हम भूल गए हैं
धयान रखिये जो दुःख व्यवस्था जनित हो उसको किसी भी प्रकार से दूर नहीं किया जा सकता है .

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સિરક્રીક વિવાદ?


ભારત અને પાકિસ્તાનની બોર્ડર પર આવેલ સિરક્રીક (દરિયાઈ ખાડી) ની એક તરફ આપણું કચ્છ છે તો બીજી તરફ પાકિસ્તાનનો સિંધ પ્રદેશ છે. ૯૬ કિલોમીટરની આ ક્રીકનો વિભાવાદ આઝાદી અને ગલા વખતથી ચાલ્યો આવે છે. સિરક્રીક વિસ્તારમાં ઓઈલ અને ગેસનો જથ્થો હોવાની શક્યતા છે. દરિયા અને નદીનું ખારું-મીઠું પાણી ભેગું થતું હોવાથી આ વિસ્તારમાં કીમતી માછલીઓ પાકે છે. અલબત્ત, વિવાદિત જગ્યા હોવાથી આ ક્રીક સંપૂર્ણપણે પ્રતિબંધિત છે. ભારત અને પાકિસ્તાન વચ્ચે આ વિવાદ ઉકેલવા માટે અનેક મંત્રણાઓ થઈ છે. તા. ૧૪થી તા. ૧૬ મે વચ્ચે નવી દિલ્હીમાં બંને દેશોના પ્રતિનિધિઓ વચ્ચે મંત્રણાઓ થવાની હતી પણ સિયાચીનનો મુદ્દો વચ્ચે નાખી પાકિસ્તાને મંત્રણા મુલતવી રાખી. આખરે શું છે આ સિરક્રીક વિવાદ?
ભારતની આઝાદી ભાગલા લઈને આવી હતી. ૧૯૪૭થી પાકિસ્તાન સાથે અનેક મુદ્દે વિવાદો ચાલતા રહ્યા છે અને યુગો સુધી ચાલતા રહેશે. પાકિસ્તાન આપણાથી જ છૂટું પડેલું આપણું સૌથી નજીકનું પડોશી છે. ભારત અને પાકિસ્તાન વચ્ચે ત્રણ મુદ્દે ચકમક ઝરતી રહે છે. તેમાં એક છે કશ્મીર, બીજું સિયાચીન અને ત્રીજું સિરક્રીક. એમ તો જૂનાગઢ અને હૈદરાબાદ મુદ્દે પણ પાકિસ્તાને ઉહાપા કર્યા છે પણ ત્યાં પાકિસ્તાન કંઈ કરી શકે તેમ નથી. આ બંને શહેર ભારતની ભૂમિ વચ્ચે આવેલાં છે, પણ બાકીના ત્રણેય વિસ્તારો બોર્ડર પર છે અને તેની માલિકી અને કબજાના મામલે બંને દેશ વચ્ચે બંદૂકો અને તોપો ધણધણતી રહે છે.
જો બધું જ નિર્ધારિત સમય મુજબ ચાલ્યું હોત તો તા. ૧૪ મી મેથી આજ દિવસ સુધી નવી દિલ્હીમાં ભારત અને પાકિસ્તાનના પ્રતિનિધિઓ વચ્ચે સિરક્રીક મુદ્દે મંત્રણા ચાલતી હોત.
પાકિસ્તાને છેલ્લી ઘડીએ સિરક્રીક મંત્રણાની બેઠક પાછી ઠેલી દીધી અને કહ્યું કે પહેલાં સિયાચીન મુદ્દે વલણ સ્પષ્ટ થાય પછી સિરક્રીક મુદ્દે વાત કરીશું. જૂનની ૧૧મી તારીખથી બંને દેશો વચ્ચે સિયાચીન મુદ્દે વાતચીત થવાની છે. એ પછી ૨૨મી જૂને સિરક્રીક મુદ્દે મંત્રણા કરવાનું નક્કી થયું છે. જોકે તેનો આધાર સિયાચીનની મંત્રણામાં શું થાય છે તેના ઉપર રહેશે. સિરક્રીકની મંત્રણા મુલતવી રાખવા પાકિસ્તાન ભલે ગમે તે બહાનાં કાઢે પણ વધુ એક વખત તેની દાનત છતી થઈ ગઈ છે.
પાકિસ્તાનની હાલત અત્યારે એવી છે કે ભારત સાથેના સંબંધમાં તે નથી આગળ વધી શકતું કે નથી પાછળ જઈ શકતું. પાકિસ્તાનના રાષ્ટ્રપતિ આસીફ અલી ઝરદારી થોડા સમય અગાઉ અજમેરમાં જિયારતના બહાને ભારત આવી ગયા. એ સમયે તેઓએ બધા મુદ્દે ખુલ્લા દિલે વાતચીત આગળ વધારવાની વાત કરી હતી. ત્યારે એવું લાગતું હતું કે સિરક્રીક મંત્રણાઓ સારી રીતે થશે પણ એવું થયું નહીં.
સિરક્રીક સાથે ગુજરાત સીધી રીતે સંકળાયેલું છે. કચ્છની બોર્ડર જમીન અને જળમાર્ગથી પાકિસ્તાન સાથે જોડાયેલી છે. આ બોર્ડર ભૌગોલિક રીતે એવી છે કે ત્યાં અવરજવર અશક્ય ન હોય તો પણ મુશ્કેલ તો ચોક્કસ છે જ. રણ, ખાડી અને દલદલ આ બોર્ડરને સ્પર્શે છે. કચ્છના જિલ્લામથક ભૂજથી ૧૬૫ કિમી. દૂર જાવ એટલે કોટેશ્વર આવે. કોટેશ્વરથી ૪૦ નોટિકલ માઈલ જાવ એટલે સિરક્રીક આવે. બોર્ડર હોવાથી આ વિસ્તાર પ્રતિબંધિત એરિયા છે. સિરક્રીકની માલિકી અંગે બંને દેશોના દાવાઓ ચાલતા રહ્યા છે.
સિરક્રીક આખરે છે શું? સાવ સરળ ભાષામાં સમજવું હોય તો કહી શકાય કે ભારત અને પાકિસ્તાનની જમીન વચ્ચે આવેલી આ એક દરિયાઈ ખાડી છે. સિરક્રીકની લંબાઈ ૯૬ કિલોમીટર છે. પાકિસ્તાન અને ભારત વચ્ચે ચાલતા આ વિવાદમાં ખાડીની બરાબર વચ્ચેથી ભાગ પાડવાની વાત છે. ખાડીના નકશા ઉપર લાઈન દોરી દેવાની અને અડધી અડધી ખાડી વહેંચી લેવાની. એમ તો આખા વિસ્તારને આંતરરાષ્ટ્રીય દરિયો ગણવાની પણ વાતો થતી આવી છે. બાકી તો બંને દેશ આખેઆખી ક્રીકની માલિકીના દાવા કરે છે. પાકિસ્તાન બોમ્બે ગવર્નમેન્ટ રિઝોલ્યુશન ઓફ ૧૯૧૪નો આધાર આગળ ધરીને સિરક્રીક પર દાવો કરે છે. એ સમયે રાવ મહારાજા ઓફ કચ્છ અને સિંધની સરકાર વચ્ચે સિરક્રીક મામલે એક સમજૂતી થઈ હતી. જોકે એ પછી તો ઘણી ઘટનાઓ બની ગઈ.
સિરક્રીકની એક તરફ આપણું કચ્છ છે તો બીજી તરફ પાકિસ્તાનનો સિંધ પ્રાંત છે. પાકિસ્તાન સિરક્રીકને નેવિગબલ એટલે કે વહાણોની અવરજવર થઈ શકે તેવી ખાડી કહે છે. જ્યારે ભારત સિરક્રીકને નોનનેવિગબલ કહે છે. અત્યારે તો આ વિસ્તારમાં પ્રતિબંધ લાદી દેવાયો છે.
હવે બીજો એક સવાલ. દરિયાઈ ખાડી હોવા છતાં બંને દેશને આ વિસ્તારમાં રસ શું છે? તેનાં અનેક કારણો છે. એક અને સૌથી મોટું કારણ એ છે કે આ વિસ્તારમાં ઓઈલ અને ગેસ મળી આવવાની શક્યતા છે. અલબત્ત, વિવાદના કારણે ત્યાં ખરેખર શું અને કેટલું છે તેનો અભ્યાસ કે તપાસ પણ થઈ શકતી નથી. છતાં આ એક એવી લાલચ છે કે જ્યાંથી આર્થિક ફાયદો થાય. બીજું એક કારણ એ છે કે આ ક્રીક વિસ્તારમાં નદી અને દરિયાના પાણીનું મિલન થાય છે. જે જગ્યાએ ખારા અને મીઠા પાણીનો સંગમ થાય છે ત્યાં કીમતી માછલીઓ પાકે છે. આ માછલીઓ પકડવાની લાલચે ઘણી વાર માછીમારો આ પ્રતિબંધિત વિસ્તારમાં જવા લલચાય છે. ઇન્ડિયન કોસ્ટ ગાર્ડ પાકિસ્તાની માછીમારોની બોટ પકડે છે અને પાકિસ્તાન કોસ્ટ ગાર્ડ ભારતીય માછીમારોની બોટને.
મુંબઈના આતંકવાદી હુમલા પછી આ ક્રીક સુરક્ષાની દૃષ્ટિએ પણ મહત્ત્વની અને જોખમી બની છે. કચ્છ બોર્ડર પર બીએસએફ એટલે કે બોર્ડર સિક્યોરિટી ફોર્સ તહેનાત છે. સામાન્ય રીતે દરિયાઈ સુરક્ષાની જવાબદારી કોસ્ટ ગાર્ડ અથવા તો નેવી હસ્તક હોય છે, પણ કચ્છની વિચિત્ર ભૌગોલિક પરિસ્થિતિને કારણે ભારતમાં સૌપ્રથમ વખત બીએસએફની વોટરવીંગ શરૂ કરવામાં આવી હતી. વોટરવીંગ અહીં સફળ ગઈ પછી દેશના બીજા વિસ્તારોમાં શરૂ કરવામાં આવી હતી.
સિરક્રીક એવો વિસ્તાર છે જ્યાં ભરતીના સમયે જ પેટ્રોલિંગ થઈ શકે છે. ઓટ વખતે દૂર સુધી પાણી અંદર ચાલ્યાં જાય છે અને ઘણા કિનારે દલદલ બની જાય છે. આ પંથકમાં જવાનો પણ ફસાઈ ગયા હોય તેવા કિસ્સાઓ અનેક વખત બન્યા છે. એટલે આ વિસ્તાર પણ ખતરાથી ખાલી નથી.
દરિયાઈ ઉપરાંત હવાઈ માર્ગે પણ બોર્ડર વાયોલેશનની ઘટનાઓ બની છે. ગુજરાતના એક મુખ્યમંત્રી બળવંતરાય મહેતાના વિમાનને પાકિસ્તાની સેનાએ કચ્છ બોર્ડર ઉપર જ ઉડાવી દીધું હતું. ૧૯૯૯માં બનેલી એક ઘટનાએ પણ બંને દેશ વચ્ચે તનાવ ઊભો કરી દીધો હતો. એ દિવસ હતો, ૧૦મી ઓગસ્ટ, ૧૯૯૯નો. કચ્છની બોર્ડર ઉપર ઊડતાં પાકિસ્તાનના નેવલ સર્વેલન્સ પ્લેનને ભારતીય વાયુસેનાના વિમાને ઉડાડી દીધું હતું. પાકિસ્તાનના વિમાનમાં પાકિસ્તાની નેવીના પાંચ ઓફિસરો સહિત ૧૬ લોકો હતા. ભારતના રડારમાં દેખાયું કે આ વિમાન ભારતીય સીમામાં ઘૂસ્યું છે. તરત જ ઇન્ડિયન એરફોર્સનું મીગ-૨૧ જેટ રવાના થયું. એર ટુ એર મિસાઈલ છોડીને પાકિસ્તાનના વિમાનને ઉડાવી દીધું. સોળેસોળ લોકોનાં મોત થયાં. ઇન્ડિયન એરફોર્સનું વિમાન સ્ક્વોર્ડન લીડર પી કે. બુંદેલા લઈને ગયા હતા. પાકિસ્તાનના વિમાનને ઉડાવી દેવાની ઘટના બાદ સ્કવોર્ડન લીડર પી.કે. બુંદેલાને વાયુસેના મેડલ પણ અપાયો હતો.
પોતાનું વિમાન ઉડાવી દેવાતા પાકિસ્તાને બુમરાણ મચાવી હતી અને ઇન્ટરનેશનલ કોર્ટ ઓફ જસ્ટિસમાં પણ ફરિયાદ કરી હતી. આ વિમાનમાં શસ્ત્રો હતાં જ નહીં અને એ પાકિસ્તાનના હવાઈ વિસ્તારમાં જ ઊડતું હતું તેવા દાવા પાકિસ્તાને કર્યા હતા. વિમાનનો ભંગાર પણ પાકિસ્તાનની હદમાં જ પડયો હતો. જોકે ભારતે કોઈ દરકાર કરી ન હતી.
કચ્છમાં રણ માર્ગે ઘૂસણખોરીના કિસ્સાઓ બનતા રહ્યા છે. અનેક પાકિસ્તાનીઓ કચ્છ બોર્ડરે પકડાયા છે. અનેક રીતે કચ્છ બોર્ડર અત્યંત સંવેદનશીલ છે, એટલે જ સિરક્રીકનું મહત્ત્વ વધી જાય છે. ભારત અને પાકિસ્તાન વચ્ચે ભૂતકાળમાં સિરક્રીક મુદ્દે અનેક મંત્રણાઓ થઈ છે પણ કોઈ પરિણામ આવ્યું નથી. આ વખતે કદાચ બેઠક થઈ હોત તો પણ કંઈ પરિણામ આવે એવું લાગતું ન હતું. આ વિવાદ ઉકલે એવા કોઈ અણસાર અત્યારે તો જોવા મળતા નથી. આ વિવાદ દાયકાઓથી ચાલ્યો આવે છે અને કદાચ સદીઓ સુધી ચાલતો રહેવાનો છે. વચ્ચે વચ્ચે છમકલાં અને મંત્રણાઓ થતાં રહેશે. જો કે છમકલાંઓને બદલે મંત્રણાઓ થતી રહે તો પણ કંઈ ખોટું નથી. આ વિવાદના કારણે આ વિસ્તારમાં પાકતી માછલીઓને આરામથી જીવી શકે તેવું અભયારણ્ય મળી ગયું છે.       

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भोपाल गैस त्रासदी पर किताब आई है- इंपीचमेन्ट

भोपाल गैस त्रासदी का गिद्धभोज

अभी दिसंबर की वैसी सर्द स्याह रातें नहीं हैं कि भोपाल गैस त्रासदी को रस्मी तौर पर ही सही, याद करें. त्रासदी के पच्चीस साल पूरे होने के बाद मीडिया के लिए भी अब भोपाल गैस त्रासदी कोई मुद्दा नहीं है. सबकुछ शांत हो चुका है. लेकिन शांत दिखते माहौल के बीच भोपाल गैस त्रासदी पर किताब आई है- इंपीचमेन्ट. यह किताब भोपाल त्रासदी के लिए संघर्ष करनेवाली नामी पत्रकार अंजली देशपांडे ने लिखा है. इस किताब में अंजलि जो कुछ बताती हैं उसे जानकर नसों एक बार फिर से नफरत का रिसाव शुरू हो जाता है. वह नफरत जो हमारी व्यवस्था से हमें अक्सर होती है. यह किताब बताती है कि कैसे भोपाल गैस त्रासदी को पिछले पच्चीस सालों में हमारी व्यवस्था और एनजीओवालों ने ऐसा गिद्धभोज बना दिया है जिसमें दावतों का दौर बदस्तूर जारी है. 

भोपाल के पीड़ितों की मदद करने के नाम पर लोगों ने अपने कैरियर बनाए, भोपाल की पीड़ितों के संघर्ष में भाग लेने के लिए विदेशों से सीधे या परोक्ष रूप से धन की वसूली की. भोपाल के गैस पीड़ितों की बीमारियों तकलीफों, उनके अनुभवों, उनकी उम्मीदों, उनकी निराशाओं तक को अंतरराष्ट्रीय मंचों और सेमिनारों में बाकायदा ठेला लगाकर बेचा गया. सरकारी अफसरों, राजनेताओं, वकीलों, एनजीओ वाले लोगों यहाँ तक कि अदालतों ने भी भोपाल के लोगों की मुसीबतों की कीमत पर मालपुआ उड़ाया.

 आज़ादी के बाद इस देश में ऐसी बहुत सारी राजनीतिक जमातें खडी हो गयी थीं जिनके नेता आजादी की लड़ाई के दौर में अंग्रेजों के साथ थे. जवाहरलाल नेहरू के जाने के बाद कुछ चापलूस टाइप कांग्रेसियों ने उनकी बेटी को प्रधानमंत्री बनवा दिया और उसी के बाद देश की राजनीति में सांप्रदायिक ताक़तों को इज्ज़त मिलनी शुरू हो गयी. १९७५ में जब इंदिरा गांधी ने अपने छोटे  बेटे को सरकार और कांग्रेस की सत्ता सौंपने की कोशिश शुरू की तब तक अपने देश की राजनीति में राजनीतिक शुचिता को अलविदा कह दिया गया था. इंदिरा गाँधी ने साफ्ट हिन्दुत्व की राजनीति को बढ़ावा देने का फैसला किया. उनके इस प्रोजेक्ट का ही नतीजा था कि पंजाब में सिखों को अलग थलग करने की कोशिश हुई. उसी दौर में राजनीति में कमीशनखोरी को डंके की चोट पर प्रवेश दे दिया गया. इंदिरा जी के परिवार के ही एक सदस्य को रायबरेली की उस सीट से सांसद चुना गया जिसे उन्होंने खुद खाली किया था. इन महानुभाव ने पहले उनके बड़े छोटे और उसकी अकाल मृत्यु के बाद इंदिरा जी के बड़े बेटे के ज़रिये राजनीतिक फैसलों को व्यापार से जोड़ दिया. हर राजनीतिक फैसले से कमीशन को जोड़ दिया गया. इसी दौर में कुछ निहायत ही गैरराजनीतिक टाइप लोग दिल्ली दरबार के फैसले  लेने लगे. इसी दौर में ६५ करोड़ की दलाली वाला बोफर्स हुआ जो कि बाद के सत्ताधीशों के लिए घूसखोरी का व्याकरण बना. इसी दौर में अपने ही देश में दुनिया का सबसे बड़ा औद्योगिक  हादसा हुआ. अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड की भोपाल यूनिट में ज़हरीली गैस लीक हुई जिसके कारण भोपाल शहर में हज़ारों लोग मारे गए और लाखों लोग उसके शिकार हुए. भोपाल गैस काण्ड के बाद अपने देश में अमरीका की तर्ज़ पर एनजीओ वालों ने काम करना शुरू किया और उन्हीं एनजीओ वालों के कारण भोपाल के पीड़ितों को न्याय नहीं मिल सका.
१९८९ में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में ४७ करोड़ डालर वाला सेटिलमेंट आया था. कुछ बहुत ही ईमानदार लोगों ने उस फैसले को चुनौती दी थी. लेकिन उनको पता भी नहीं चला और दिल्ली में आपरेट करने वाले कुछ अंतरराष्ट्रीय धंधेबाजों ने यूनियन कार्बाइड के खिलाफ चल रहे संघर्ष को को-आप्ट कर लिया. १९८९ में आये इस फैसले और उसके खिलाफ दिल्ली में चल रहे संघर्ष में शामिल कुछ ईमानदार और कुछ बेईमान लोगों के काम के इर्द गिर्द लिखी गयी एक किताब बाज़ार में आई है इंपीचमेन्ट. नामी पत्रकार अंजली देशपांडे ने बहुत ही कुशलता से उस दौर में दिल्ली में सक्रिय कुछ युवतियों की ज़िंदगी के हवाले से उस वक़्त के राजनीतिक के सन्दर्भ का इस्तेमाल करते हुए एक कहानी बयान की है. मूल रूप से भोपाल की त्रासदी के बारे में लिखी गयी यह किताब उपन्यास है लेकिन इसे केवल उपन्यास नहीं कहना चाहिए. जिन लोगों ने उस दौर में भोपाल और उसके नागरिकों के दर्द को दिल्ली के सेमिनार सर्किट में देखा सुना है उनको इस किताब में लिखी गयी बातें एक रिपोर्ताज जैसी लगेगीं. इस किताब के कुछ जुमले ऐसे हैं जो उन लोगों को सार्वकालीन सच्चाई लगेगें जिन्होंने दिल्ली के दरबारों में भोपाल के गैस पीड़ितों के दर्द का सौदा होते देखा है.

इस किताब की ख़ास बात यह है कि हमारे समय की तेज़ तर्रार पत्रकार अंजली देशपांडे ने सच्चाई को बयान करने के लिए कई पात्रों को निमित्त बनाया है. हालांकि किताब का कथानक भोपाल के गैस पीड़ितों के दर्द को पायेदार चुनौती देने की कोशिश के बारे में है लेकिन साथ साथ सरकार, न्यायपालिका, राजनेता, मौक़ापरस्त बुद्दिजीवियों और व्यापारियों को आइना दिखा रही औरतों की अपनी ज़िंदगी की दुविधाओं के ज़रिये मेरे जैसे कन्फ्यूज़ लोगों को औरत की इज्ज़त करने की तमीज  सिखाने का प्रोजेक्ट भी इस किताब में मूल कथानक के समानांतर चलता रहता है. नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों के पुरुष वर्चस्ववादी समाज में मौजूद उन लोगों को भी औकातबोध कराने का काम भी इस किताब में बखूबी किया गया है जो औरत की शक्ति को कमतर करके देखते हैं. दिल्ली की भोगवादी संस्कृति में सत्तासीन अफसर की कामवासना का शिकार हो रही औरत भी अपनी पहचान के प्रति सजग रह सकती है और अपने फैसले खुद ले सकती है, यह बात अंजली ने बहुत ही साधारण तरीके से समझा दी है. अक्सर देखा गया है कि औरत के अधिकार की बात करते हुए  वैज्ञानिक समझ वाला पुरुष भी गार्जियन बनने की कोशिश करने लगता है. इस किताब की औरतों को देखा कर लगता है कि उन लोगों की सोच पर भी लगाम लगाने का काम अंजली देशपांडे ने बखूबी किया है .

भोपाल के बाद और पीवी नरसिंह राव के पहले भारतीय राजनीति पूंजीवादी दर्शन की शरण में जाने के लिए जिस तरह की कशमकश  से गुज़र रही थी उसकी भी दस्तक, इम्पीचमेंट नाम की इस अंग्रेज़ी किताब में सुनी जा सकती है. आजएनजी ओ वाले इतने ताक़तवर हो गए हैं कि वे संसद को भी चुनौती देने लगे हैं. लेकिन अस्सी के दशक में वे ऐलानियाँ बाज़ार में आने में डरते थे और परदे के पीछे से काम करते थे. इस कथानक में जो आदमी शुरू से ही भोपाल के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सक्रिय है वह दिल्ली में पाए जाने वाले दलाली संस्कृति का ख़ास नमूना है. वह कुछ ईमानदार  लोगों को इकठ्ठा करता है, उनको बुनियादी समर्थन देता है लेकिन आखिर में पता लगता है कि बाकी लोग तो न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन वह न्याय की लड़ाई लड़ाने के धंधा कर रहा था. आज तो ऐलानियाँ फोर्ड फाउंडेशन से भारी रक़म लेकर एनजीओ वाले संसद को चुनौती देने के लिए चारों तरफ ताल ठोंकते नज़र आ जायेगें लेकिन उन दिनों अमरीकी संस्थाओं से पैसा लेना और उसको स्वीकार करना बिलकुल असंभव था. खासकर अगर उस पैसे का इस्तेमाल  भोपाल जैसी त्रासदी के खिलाफ न्याय लेने के लिए किया जा रहा हो. लेकिन पैसा लिया गया और पवित्र अन्तः करण से लड़ाई लड़ रही औरतों को आखिर में साफ़ लग गया कि आन्दोलन वासत्व में शुरू से  ही सरकारी एजेंटों के हाथ में था और ईमानदारी से न्याय की लड़ाई लड़ रही लडकियां केवल उसी पूंजीवादी लक्ष्य को हासिल करने के लिए औज़ार बनायी गयी थीं. उनके कारण ही सुप्रीम कोर्ट और सरकार की मिलीभगत को दी जा रही चुनौती को विश्वसनीय बनाया जा सका. भोपाल के हादसे से भी बड़ा हादसा दिल्ली के दरबारों में हुआ था जब सत्ता में शामिल सभी लोग मिल कर यूनियन कार्बाइड के कारिंदे बन गए थे. पूरी किताब पढ़ जाने के बाद यह बात बहुत ही साफ़ तरीके से सामने आ जाती है.
स्थापित सत्ता किस तरह ईमानदार लोगों का शोषण करती है उसको भी समझा जा सकता है. दिल्ली में कुछ लोग ऐसे हैं जो हर सेमिनार में मिल जाते हैं. वे अपने आप को सम्मानित व्यक्ति कहलवाते हैं. हर तरह के अन्याय के खिलाफ बयान देते है और बाद में अन्यायी से मिल जाते हैं. १९८९ में सुप्रीम कोर्ट  की निगरानी में हुए सेटिलमेंट के बाद यह लोग भी सक्रिय हो गए थे और उनके खोखलेपन को भी समझने का मौक़ा यह किताब देती है .किसी भी न्याय की लड़ाई में किस तरह से अवसरवादियों की यह प्रजाति घुस लेती है, उसका भी अंदाज़ १९८९ की इन घटनाओं से साफ़ लग जाता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निराश दिल्ली में सक्रिय न्याय की योद्धा औरतों ने जब उन जजों के इम्पीचमेंट यानी महाभियोग की बात की तो उसको खारिज करवाने के लिए स्थापित  सत्ता ने जो  तर्क दिए वह भी पूंजीवादी संस्कृति में मौजूद दलाली के जीनोम को रेखांकित कर देती है उन तर्कों को काट  पाना आसान नहीं है .किताब के एक चरित्र हैं कानून के शिक्षक, प्रोफ़ेसर थापर. वे सवाल पूछते हैं कि  किस पर महाभियोग चलेगा उन नेताओं और अफसरों पर जिनको कार्बाइड ने भारी रक़म दी? क्या आपको मालूम है कितने नेताओं की पत्नियां न्यूयार्क में खरीदारी करने गयी थीं और उनका सारा भुगतान कार्बाइड ने किया था? क्या आप उन सभी अफसरों पर महाभियोग चलायेगें  जो भोपाल की कार्बाइड फैक्टरी में जांच करने गए थे और लौट कर बताया कि सब कुछ ठीक है या उन डाक्टरों पर जिन्होंने सिद्धांत बघारा कि भोपाल में गैस से कोई  नहीं मरा था, बल्कि मरने वाले वे लोग हैं जो बीमार थे या वैसे भी मरने वाले थे. या उन अर्थशास्त्रियों पर  अभियोग चलायेगें जो कहते हैं कि कार्बाइड जैसे उद्योगों की हमें बहुत ज़रुरत है क्योंकि उसी से तरक्की होती है. भोपाल हादसे के बाद उस सहारा पर मौत की छाया पड़ गयी थी लेकिन जिस तरह से दिल्ली के गिद्धों ने उस हादसे को अपनी आमदनी का साधन बनाया वह अंजली देशपांडे की किताब में बहुत ही शानदार तरीके से सामने आया है.

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